mera noor tu hain

पनाह मेरी यार मेरे, शौक की फटकार मेरे,
मालिको मौला भी हो, और हो पहरेदार मेरे

नूह तू ही रूह तू ही, कुरंग तू ही तीर तू ही,
आस ओ उम्मीद तू है, ग्यान के दुआर मेरे

नूर तू है सूर तू, दौलते-मन्सूर तू,
बाजेकोहेतूर तू, मार दिए ख़राश मेरे ।

कतरा तू दरिया तू, गुंचा-ओ-खार तू,
शहद तू ज़हर तू, दर्द दिए हज़ार मेरे ।

सूरज का घरबार तू, शुक्र का आगार तू,
आस का परसार तू, पार ले चल यार मेरे ।

रोज़ तू और रोज़ा तू, मँगते की खैरात तू,
गागरा तू पानी तू, लब भिगो इस बार मेरे ।

दाना तू ओ जाल तू, शराब तू ओ जाम तू,
अनगढ़ तू तैयार तू, ऐब दे सुधार मेरे ।

न होते बेखुदी में हम, दिल में दर्द होते कम,रा
ह अपनी चल पड़े तुम, सुने कौन आलाप मेरे

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Kalam Bu Ali Shah Qalandar

मनम मेहर-ए-जमाल-ए-ऊ नमी दानम कुजा रफ़्तम
शुदम ग़र्क़-ए-विसाल-ए-ऊ नमी दानम कुजा रफ़्तम

ग़ुलाम-ए-रु-ए-ऊ बूदम असीर-ए-मू-ए-ऊ बूदम
गु़बार-ए-कू-ए-ऊ बूदम नमी दानम कुजा रफ़्तम

बा-आँ मह-आश्ना गश्तम ज़े-जान-ओ-दिल फ़िदा गश्तम
फ़ना गश्तम फ़ना गश्तम नमी दानम कुजा रफ़्तम

शुदम चूँ मुब्तला-ए-ऊ निहादम सर ब-पा-ए-ऊ
शुदम मेहर-ए-लक़ा-ए-ऊ नमी दानम कुजा रफ़्तम

‘क़लन्दर’-बू-अली हस्तम ब-नाम-ए-दोस्त सर-मस्तम
दिल अंदर इश्क़-ए-ऊ बस्तम नमी दानम कुजा रफ़्तम

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Sufism Kalam Bu Ali Shah

ग़ैरत अज़ चश्म बुरम रु-ए-तू दीदन न-देहम
गोश रा नीज़ हदीस-ए-तू शनीदन न-देहम

हदिय:-ए-ज़ुल्फ़-ए-तू गर मुल्क-ए-दो-आ’लम ब-देहन्द
या’लमुल्लाह सर-ए-मूए ख़रीदन न-देहम

गर बयाद मलक-उल-मौत कि जानम ब-बरद
ता न-बीनम रुख़-ए-तू रूह रमीदन न-देहम

गर शबे दस्त देहद वस्ल-ए-तू अज़ ग़ायत-ए-शौक़
ता-क़यामत न शवद सुब्ह दमीदन न-देहम

गर ब-दाम-ए-दिल-ए-मन उफ़्तद आँ अन्क़ा बाज़
गरचे सद हमल: कुनद बाज़ परीदन न-देहम

‘शरफ़’ अर बाद वज़द बोए ज़े-ज़ुल्फ़श ब-बरद
बाद रा नीज़ दरीं दहन वज़ीदन न-देहम

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Bu Ali Shah Sufism Kalam

ज़हे-हुसने कि रू-ए-यार दारद
कि दर आग़ोश सद गुलज़ार दारद

सर-ए-ज़ुल्फ़श कि मस्त-ओ-ला-उबाली
कमीँ-गाह-ए-दिल-ए-हुश्यार दारद

बसे मर्दां ज़े-कार उफ़्तादः बीनी
बदाँ चश्मे कि ऊ बीमार दारद

हर आँ सत्रे के बर रूयश नविश्तन्द
हज़ाराँ मानी-ओ-असरार दारद

दिलम दर याद-ए-मिज़्गानत चुनाँ अस्त
कि मी-ख़्वाहद सरे बर दार दारद

‘शरफ़’ दर इश्क़-ए-ऊ गश्त आँ ‘क़लन्दर’
कि हफ़्ताद-ओ-दो-मिल्लत यार दारद

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Bu Ali Shah Qalandar Sufism Kalam

मनम मेहर-ए-जमाल-ए-ऊ नमी दानम कुजा रफ़्तम
शुदम ग़र्क़-ए-विसाल-ए-ऊ नमी दानम कुजा रफ़्तम

ग़ुलाम-ए-रु-ए-ऊ बूदम असीर-ए-मू-ए-ऊ बूदम
गु़बार-ए-कू-ए-ऊ बूदम नमी दानम कुजा रफ़्तम

बा-आँ मह-आश्ना गश्तम ज़े-जान-ओ-दिल फ़िदा गश्तम
फ़ना गश्तम फ़ना गश्तम नमी दानम कुजा रफ़्तम

शुदम चूँ मुब्तला-ए-ऊ निहादम सर ब-पा-ए-ऊ
शुदम मेहर-ए-लक़ा-ए-ऊ नमी दानम कुजा रफ़्तम

‘क़लन्दर’-बू-अली हस्तम ब-नाम-ए-दोस्त सर-मस्तम
दिल अंदर इश्क़-ए-ऊ बस्तम नमी दानम कुजा रफ़्तम

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Bu Ali Shah Qalandar Kalam

अगरचे मोमिनम या बुत-परस्तम
क़ुबूलम कुन निगारा हर-चे हस्तम

यके काफ़िर दो-सद बुत मी-परस्तद
मनम मिस्कीं यके रा मी-परस्तम

बुते दारम दरून-ए-सीन:-ए-ख़्वेश
ब-रोज़-ओ-शब मन आँ बुत रा परस्तम

मरा गोयन्द चरा बुत मी-परस्ती
चू यारम बुत बूवद मन मी-परस्तम

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Kalam Bulleh Shah

रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई ।
सद्दो नी मैनूं धीदो रांझा, हीर ना आखो कोई ।

रांझा मैं विच्च मैं रांझे विच्च, होर ख़्याल ना कोई ।
मैं नहीं उह आप है, आपनी आप करे दिलजोई ।
रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई ।

हत्थ खूंडी मेरे अग्गे मंगू, मोढे भूरा लोई ।
बुल्ल्हा हीर सलेटी वेखो, कित्थे जा खलोई ।

रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई ।
सद्दो नी मैनूं धीदो रांझा, हीर ना आखो कोई ।

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Bulleh Shah Kalam

कह बुल्ल्हा हुन प्रेम कहाणी, जिस तन लागे सो तन जाणे,
अन्दर झिड़कां बाहर ताअने, नेहुं ला इह सुक्ख पाइआ ए ।
मेरे माही क्युं चिर लाइआ ए ।

नैणां कार रोवन दी पकड़ी, इक मरना दो जग्ग दी फकड़ी,
ब्रेहों जिन्द अवल्ली जकड़ी, नी मैं रो रो हाल वंजाइआ ए ।
मेरे माही क्युं चिर लाइआ ए ।

मैं प्याला तहकीक लीता ए जो भर के मनसूर पीता ए,
दीदार मिअराज पिया लीता ए मैं खूह थीं वुज़ू सजाया ए ।
मेरे माही क्युं चिर लाइआ ए ।

इश्क मुल्लां ने बांग दिवाई, शहु आवन दी गल्ल सुणाई,
कर नीयत सजदे वल्ल धाई, नी मैं मूंह महराब लगाया ए ।
मेरे माही क्युं चिर लाइआ ए ।

बुल्ल्हा शहु घर लपट लगाईं, रसते में सभ बण तण जाईं,
मैं वेखां आ इनायत साईं, इस मैनूं शहु मिलाइआ ए ।
मेरे माही क्युं चिर लाइआ ए ।

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Bulleh Shah Urdu Kalam

परदा किस तों राखीदा ।
क्युं ओहले बह बह झाकी दा ।

पहलों आपे साजन साजे दा, हुन दस्सना एं सबक नमाजे दा,
हुन आया आप नज़ारे नूं, विच लैला बण बण झाकी दा ।
परदा किस तों राखीदा ।

शाह शम्मस दी खल्ल लुहाययो, मनसूर नूं सूली दवायओ,
ज़करीए सिर कलवत्तर धराययो, की लेखा रहआ बाकी दा ।
परदा किस तों राखीदा ।

कुन्न केहा फअकून कहाइआ, बे-चूनी दा चून बणाइआ,
खातर तेरी जगत बणाइआ, सिर पर छतर लौलाकी दा ।
परदा किस तों राखीदा ।

हुन साडे वल धाइआ ए ना रहन्दा छुपा छुपाइआ ए,
किते बुल्ल्हा नाम धराइआ ए विच ओहला रक्ख्या ख़ाकी दा ।

परदा किस तों राखीदा ।
क्युं ओहले बह बह झाकी दा ।

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Bulleh Shah Hindi Kalam

दूर दूर असाथों ग्युं, अजला (अरशां) ते आ के बह रहउं,
की कसर कसूर विसारिआ, सानूं आ मिल यार प्यारिआ ।

मेरा इक अनोखा यार है, मेरा ओसे नाल प्यार है,
किवें समझें वड परवाइआ, सानूं आ मिल यार प्यारिआ ।

जदों आपनी आपनी पै गई, धी मां नूं लुट्ट के लै गई,
मूंह बाहरवीं सदी पसारिआ, सानूं आ मिल यार प्यारिआ ।

दर खुल्ल्हा हशर अज़ाब दा, बुरा हाल होया पंजाब दा,
डर हावीए दोज़ख मारिआ, सानूं आ मिल यार प्यारिआ ।

बुल्ल्हा शहु मेरे घर आवसी, मेरी बलदी भा बुझावसी,
इनायत दमदम नाल चितारिआ, सानूं आ मिल यार प्यारिआ ।

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