adam se layi hai hasti me aarzuu-e-rasuul

आदम से लायी है हस्ती मे. आरज़ू-ए-रसूल
कहाँ कहाँ लिए फिरती है जुस्त्तजु-ए-रसूल

ख़ुशा वो दिल की हो जिस दिल मे आरज़ू-ए-रसूल
खुश वो आँख जो हो महवे-ए-हुस्न-ए-रुए-रसूल

तलाश-ए-नक़्श-ए-काफये-पा-ए-मुस्तफ़ा की क़सम
चुने है आखो से ज़रराटे-ए-ख़ाके क़ुए-ए-रसूल

फिर उन के नशा-ए-इरफ़ान का पुछना क्या है
जो पी चुके हैं अजल में माय सुब्बू-ए-रसूल

बलाए लू तेरी ऐ जज्ब-ए-शौक-ए-सल्ली-आला
की आज दमन-ए-दिल खिंच रहा है सू-ए-रसूल

शगुफ्ता गुलशन-ए-जहरा का हर गुल-ए-तर है
किसी में रंग-ए-अली और किसी में बू-ए-रसूल

अजब तमाशा हो मैदान-ए-हशर में ‘बेदम’
की सब हो पेश-ए-खुदा और मैं रु-ब-रु-ए-रसूल

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kasti-ey-dil ke na khuda salle-ala-mohammad

कास्ती-ए-दिल के ना खुदा सल्ले-अला-मोहम्मद
नुहे बनी के पेशबा सल्ले-अला-मोहम्मद

माहा-बा-शो के मैयलका अहेले दिलो के दिल-रूबा
रूही फिदा एक मरहबा सल्ल्ले-अल्ला-मोहम्मद

अहमद अहद के राज़ का मीम ही पर्दा दार था
आप मे आप था छुपा सल्ले-अला-मोहम्मद

खुद ही बुलाया खुद ही गया बनके क़लीम तूर पर
खुद ही गॅश आया बोल उठा सल्ले-अला-मोहम्मद

करती है शोर बुल-बुले, नगमा सारा है कुमरिया
धूम पढ़ी है जां-वा-जान सल्ले-अला-मोहम्मद

बेदम खुस्ता तन से आज देखा चमन मे माजरा
बर्ग को गुल ने दी सदा सल्ले-अला-मोहम्मद

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aayi naseem-e-koo-e-mohammad

आई नसीम-ए- कूए मुहम्मद
सल्ल-लल-लाहो आलैहे वस्लम |

खिचने लगा दिल सू-ए-मुहम्मद
सलल्ला हो अलैही वसल्लम |

ऐ सबा क्या याद फरमाया है
आका ने मुझे सुये मोहम्मद |

काबा हमारा कुये मोहम्मद
सलल्ला हो अलैही वसल्लम |

मिद-हते ईमां रु-ए-मोहम्मद
सलल्ला हो अलैही वसल्लम |

तूबा की जानिब तकने वालों
आँखे खोलो होश संभालो |

देखूँ क़द ए‌ दिल जुये मोहम्मद
सलल्ला हो अलैही वसल्लम |

नाम इसी का बाबे करम है।
देखो यही मेहरबे हरम है

देखो ख़म ए अबरू-ए‌ मोहम्मद
सलल्ला हो अलैही वसल्लम

खैरुल बशर खैरुल वरा
सल्ले अला सल्ले अला

शम्स-उद दुहा बदरुद दुजा
सल्ले अला सल्ले अला

हम सब का रुख़ सू-ए काबा,
सू-ए मोहम्मद रू-ए काबा

काबे का काबा कू-ए मोहम्मद
सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम

भीगी भीगी खुशबु लेहकी
बेदम दिल की दुनिया महकी

खुल गए जब गेसुये मोहम्मद
सलल्ला हो अलैही वसल्लम

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Aaj Karna Hai Charaghañ Sar-e Mizgan Mujhko hindi naatiya kalaam

आज करना है चराग़ां सरे मिजगां मुझको
ख़ुशनसीबी से मिला है दरे जानां मुझको

आपकी ज़ात को अल्लाह सलामत रखे
आप जैसा न मिला कोई निगेहबां मुझको

मैं गुनहगार कहां दामन ए सरकार कहां
मिल गया तेरे करम से तेरा दामां मुझको

जिंदगी आपके कदमों पे निछावर कर दूं
आप मिल जाएं अगर ऐ मेरे जानां मुझको

क्या तलब तुझसे करूं इतना नवाज़ा तूने
सर उठाने नहीं देते तेरे एहसां मुझको

आपकी चश्मे इनायत के मैं कुर्बां जाऊं
आईना देखके होता है पशेमां मां मुझको

आज फिर मेरे मुक़द्दर की बर आई क़िस्मत
आज फिर आके मिले हैं मेरे जानां मुझको

और तो कोई तमन्ना ही नहीं है सादिक़
आरज़ू है के मिले जल्वा ए जाना मुझको

आज करना है चराग़ां सरे मिजगां मुझको
ख़ुशनसीबी से मिला है दरे जानां मुझको

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Bhula Khuda hai aap ko jiske khayaal mein hindi naat

भुला खुदा है आप को जिसके ख्याल में
क्या शान- ए- दिल बरी है नबी के जमाल मे

अपना ही हुस्न जा के वहाँ भी नज़र पडा
पहुंचे नबी जो अर्श पे शौके विसाल में

मेंराज में खुदा बा नबी एक हो गये
शान-ए- जमाल मिल गयी शान- ए- जमाल में

बलाएँ पे मेरी आओ नबी वक़्ते नज़ा हैं
जाती हैं जान आप के शौके बिसाल में

या शा-फये उमम मेरी सूरत सवाल है
वाक़िफ़ हैं आप लुफ्त नही है सवाल मे

शाने नबी को शाने खुदा मैं नज़र करो
देखो खुदा का हाल मोहम्मद के हाल मे

क्या सिर्र-अहमदी को बयाँ कि जिये मुजीब
आता नही हाल किसी तरह काल मैं

कलामे मुजीब
सूफी मोहम्मद तालिब हुसैन फारुखबदी मुजीबी

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Khushiya manao sarkaar aa gaye

जिंदगी अपनी यू खुशनुमा कीजिए
जिक्रे अहमद हमेशा किया कीजिए

दर्स हमको मिला ये नबी पाक से
दुश्मनों के भी हक में दुआ कीजिए

कामयाबी की कुंजी अगर चाहिए
सरवरे दीन से राब्ता कीजिए

वह सफायत करेंगे यकीनन मगर
आप पाबंदे सुन्नत रहा कीजिए

लज़्ज्ते ज़िक्र का फिर मजा आएगा
पहले दिल को बलाली बना लीजिए

हर बला सर से चलती रहेगी सदा
सानी सजदा खुशी से दिया कीजिए

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Ye bill yaki hussain hai nabi ka noor-e-ain hai

यह कौन ज़ी वक़ार है, बला का शह सवार है
के है हज़ारों कातिलों के सामने डटा हुआ

यह बिल यक़ीं हुसैन है नबी का नूर ए ऐन है
हुसैन है हुसैन है नबी का नूर ए ऐन है

यह कौन हक़-परस्त है, मय-ए रज़ा ए मस्त है
के जिसके सामने कोई बुलंद है न पस्त है
उधर हज़ार घात है, मगर अजीब बात है
के एक से हज़ार का भी हौसला शिकस्त है

यह बिल यक़ीं हुसैन है नबी का नूर ए ऐन है
हुसैन है हुसैन है नबी का नूर ए ऐन है

हुसैन जिसकी सदा ला इलाहा इलल्लाह
हुसैन जिसकी अदा ला इलाहा इलल्लाह
हुसैन जिसकी सना ला इलाहा इलल्लाह
हुसैन जिसकी दुआ ला इलाहा इलल्लाह

जो दहकती आग के शोलों पे सोया वो हुसैन
जिसने अपने ख़ून से आ़लम को धोया वो हुसैन
जो जवां बेटे की मैय्यत पर न रोया वो हुसैन
जिसने सब कुछ खो के फिर भी कुछ न खोया वो हुसैन

रस्म-ए उश्शाक़ यही है के वफ़ा करते हैं
य़ानी हर हाल में हक़ अपना अदा करते हैं
हौसला हज़रत-ए शब्बीर का अल्लाह अल्लाह
सर जुदा होता है और शुक्र-ए ख़ुदा करते हैं

दिलावरी में फ़र्द है बड़ा ही शेर मर्द है
के जिसके दबदबे से रंग दुश्मनों का ज़र्द है
हबीब ए मुस्तफा है ये मुजाहिद ए ख़ुदा है ये
जभी तो इसके सामने यह फौज गर्द गर्द है

यह बिल यक़ीं हुसैन है नबी का नूर ए ऐन है
हुसैन है हुसैन है नबी का नूर ए ऐन है

ईमान की तौक़ीर कहा जाता है
क़ुरआन की तफ़्सीर कहा जाता है
बातिल के सामने जो कभी झुक न सकी
उस ज़ात को शब्बीर कहा जाता है

उधर सिपाह-ए शाम है हज़ार इन्तिज़ाम
उधर हैं दुश्मनान-ए दीं इधर फ़क़त इमाम है
मगर अ़जीब शान है ग़जब की आन-बान है
के जिस तरफ़ उठी है तेग़ बस ख़ुदा का नाम है

यह जिसकी एक ज़र्ब से, कमाल ए फ़न-ए ह़र्ब से
कई शकी गिरे हुए तड़प रहे हैं कर्ब से
गजब है तेग़-ए दो सिरा के एक एक वार पर
उठी सदा ए अलअमा ज़बान-ए शर्क़ ओ ग़र्ब से

अ़बा भी तार तार है, तो जिस्म भी फ़गार है
ज़मीन भी तपी हुई, फलक भी शोला बार है
मगर ये मर्द-ए तेग़ज़न, ये सफ़ शिकन, फ़लक फ़िगन
कमाल-ए सब्र ओ तन दिही से मह्व-ए कारज़ार है

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Ya Hussain Ya Hussain

आया न होगा इस तरह हुस्नो-शबाब रेत पर
गुलशन-ए-फ़ातिमा के थे सारे गुलाब रेत पर

जान-ए-बतूल के सिवा कोई नहीं खिला सका
कतरा-ए-आब के बग़ैर इतने गुलाब रेत पर

जितने सवाल इश्क़ ने आले-रसूल से किये
एक के बाद एक दिये सारे जवाब रेत पर

इश्क़ में क्या बचाइये, इश्क़ में क्या लुटाइये
आले-नबी ने लिख दिया सारा निसाब रेत पर

प्यासा हुसैन को कहूं इतना तो बे-अदब नहीं
लमसे लबे हुसैन को तरसा है आब रेत पर

आले-नबी का काम था, आले-नबी ही कर गए
कोई न लिख सका अदीब ऐसी किताब रेत पर

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gaflat me kati mori sari umariya

ग़फ़लत में कटी मोरी सकरी उमरिया
करो मो पे अपनी दया ग़ौस-ए-आज़म

ज़माने में नहीं सुनता कोई फ़रियाद जीलानी
ख़ुदारा आप ही कीजे मेरी इमदाद जीलानी

करो इमदाद ऐ लख्ते-दिले-मुश्क़िल-कुशा-हैदर
गिरा हूँ ग़र्दिशों में, हूँ बड़ा नाशाद जीलानी

फ़साने ग़म के तुम से ना कहूं तो फिर कहूं किस से
मेरी सुन लो मेरी सुन लो मेरी रूदाद जीलानी

मेरी शाम-ए-ख़ज़ाँ सुब्हे-बहारा में बदल जाए
रुखे-पुरनूर दिखला कर करो तुम शाद जीलानी

समंदर में ग़मों के पाएगा ये साहिल-ए-तस्कीन
उजागर देख ले आ कर तेरा बग़दाद जीलानी

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Ye sab tumhara Karam hai Aaka ke baat ab tak bani huyi hai

कोई सलीका है आरज़ू का, न बन्दगी मेरी बन्दगी है
ये सब तुम्हारा करम है आक़ा के बात अब तक बनी हुई है

अता किया मुझको दर्दे-उल्फ़त, कहां थी ये पुर-ख़ता की क़िस्मत
मैं इस करम के कहां था क़ाबिल, हुज़ूर की बन्दा परवरी है

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा, जो करम मुझ पे मेरे नबी कर दिया
मैं सजाता हूँ सरकार की महफिलें, मुझ को हर ग़म से रब ने बरी कर दिया

ज़िक्रे-सरकार की हैं बड़ी बरकतें, मिल गई राहतें, अज़मतें, रिफ़अतें
कोई सिद्दिक़, फ़ारूक़, उस्मां हुवे और किसीको नबी ने अली कर दिया

तजल्लियों के कफील तुम हो, मुरादे-क़ल्बे ख़लील तुम हो
ख़ुदा की रोशन दलील तुम हो, ये सब तुम्हारी ही रोशनी है

किसी का एहसान क्यूं उठाएं, किसी को हालात क्यूं बताएं
तुम्हीं से मांगेंगे तुम ही दोगे, तुम्हारे ही दर से लो लगी है

अमल की मेरे असास क्या है, बजुज़ नदामत के पास क्या है
रहे सलामत बस आप की निस्बत, मेरा तो बस आसरा यहीं है

जितना दिया सरकार ने मुझ को उतनी मेरी औक़ात नहीं
ये तो करम है उनका वरना मुझ में तो ऐसी बात नहीं

इश्क़े-शहे-बतहा से पेहले मुफ़लिसो-ख़स्ताहाल था मैं
नामे-मुहम्मद के मैं क़ुरबां, अब वो मेरे हालात नहीं

गौर तो कर सरकार की तुझ पर कितनी ख़ास इनायत है
कौसर तू है इनका सनाख्वां ये मामूली बात नहीं

बशीर कहिये, नज़ीर कहिये, इन्हें सिराजे-मुनीर कहिये
जो सर बसर है कलामे-रब्बी, वो मेरे आक़ा की ज़िन्दगी है

यहीं है ख़ालिद असासे-रहमत, यहीं है ख़ालिद बिनाए-अज़मत
नबी का इरफ़ान बन्दग़ी है, नबी का इरफ़ान ज़िन्दगी है

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