bahut kathin hai dagar pnghat ki

बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी

पनिया भरन को मैं जो गई थी
दौड़ झपट मोरी मटकी पटकी

बहुत कठिन है डगर पनघट की
‘ख़ुसरव’ निज़ाम के बल-बल जइए

लाज रखो मेरे घूँघट पट की
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की

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tori surat ke balihari nizam

तोरी सूरत के बलिहारी निजाम
तोरी सूरत के बलिहारी
सब सखियन में चुनर मेरी मैली
देख हँसें नर-नारी निजाम

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे
पिया रख ले लाज हमारी निजाम

सदक़: बाबा-‘गंज-शकर’ का
रख ले लाज हमारी निजाम

‘क़ुतुब-फ़रीद’ मिल आए बराती
‘ख़ुसरव’ राज-दुलारी निजाम

कोऊ सास कोऊ ननद से झगड़े
हम को आस तिहारी निजाम
तोरी सूरत के बलिहारी निजाम

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Mohe apne hi rang me rangde

मोहे अपने ही रंग में रंग दे रंगीले
तो तू साहेब मेरा महबूब-ए-इलाही

हमरी चदरिया पिया की पगरिया दोनों बसंती रंग दे
तो तू साहेब मेरा महबूब-ए-इलाही

जो तू माँगे रंग की रंगाई मेरा जोबन गिरवी रख ले
तो तू साहेब मेरा महबूब-ए-इलाही

आन परी तोरे दरवाजे पर मिरी लाज-शरम सब रख ले
तो तू साहेब मेरा महबूब-ए-इलाही

‘निजामुद्दीन-औलिया’ हैं पीर मेरो प्रेम पीत का संग दे
तो तू साहेब मेरा महबूब-ए-इलाही

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