dukh apna hame batana nhi aata Urdu Ghazal | Hindi Ghazal – Ghazal.

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

पहुँचा है बुज़ुर्गों के बयानों से जो हम तक
क्या बात हुई क्यूँ वो ज़माना नहीं आता

मैं भी उसे खोने का हुनर सीख न पाया
उस को भी मुझे छोड़ के जाना नहीं आता

इस छोटे ज़माने के बड़े कैसे बनोगे
लोगों को जब आपस में लड़ाना नहीं आता

ढूँढे है तो पलकों पे चमकने के बहाने
आँसू को मिरी आँख में आना नहीं आता

तारीख़ की आँखों में धुआँ हो गए ख़ुद ही
तुम को तो कोई घर भी जलाना नहीं आता

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Hai tera tasabbur teri lagan dil tujse lagaye baithe hai [fana bulandi ghazal]

है तेरा तसब्बुर तेरी लगन दिल तुजसे लगाए बैठे है
एक याद में तेरी जाने जहाँ हम खुद को भुलाये बैठे है

झुकती है नज़र सजदे के लिए होती है नमाज़े इसक अदा
मिराजे इबादत क्या कहिये वो सामने आये बैठे है

नज़रो का तकाज़ा पूरा करो एक बार तो जलवा दिख ला दो
ये अहले जुनूँ ये दीवाने उम्मीद लगाए बैठे है

तस्लीम-बा-रज़ा की मंज़िल में दिल जान तो कोई चीज़ नहीं
हम तेरी अदाओ पर जाना ईमान लुटाये बैठे है

देखो तो ज़रा ये भोला पन इस नाज़ो अदा का क्या कहना
दिल ले के हमारा महफ़िल में नज़रो को छुपाये बैठे है

इस हुस्न पे दुनया मरती है एक हम नहीं शैदा उनके
मालूम नहीं ये कितनो को दीवाना बनाये बैठे है

हस्ती है सरबरे मस्ती में अब होश का दावा कौन करे
वो मस्त नज़र से हमको फ़ना मस्ताना बनाये बैठे

 

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Hindi Ghazal Tuur kyu khaak huya noor tera naaz na tha[daag delvi]

तूर क्यों ख़ाक हुआ नूर तेरा नाज़ न था
नाज़ था हज़रते मूसा से वो दीदार न था

हमी-चूं के गम-ए दिल काबिल-ए न था
बात में यार ये बिगड़ा के कबि यार न था

आसमान पायों पड़ा है के क़यामत है ज़ालिम
यूँ तो चलता हुआ हर फितना रफ़्तार न था

दिल हुआ ख़ाक तो अक्सीर किसी ने जाना
था ये जब माल तो कोई भी खरीदार न था

ज़िक्रे मजनू से मुझे आग लग जाती है
गर-चे ज़ाहिर है वो तुम्हारा तलब गार न था

याद आती थी हसीनो को ये अंदाज़े ज़फ़ा
या कोई अगले ज़माने में खता बार न था

शब् को क्यों न कर ख़ालिशे दिल न दिखाती लज़्ज़त
तेरा अरमान था, पैकान न था खार न था

गमे जावेद की लज़्ज़त मेरे दिल से पूछो
मिल गया वो मुझको जिसका मैं सज़ादार न था

बात क्या चाहिए जब मुफ्त की हुज्जत ठैरी
उस गुन्हा पे मुझे मारा के गुन्हा गार न था

क्यों मेरे बाद उठया सितम इस्के रकीब
क्या मेरे दाग से ज़ालिम ये गर अंबार न था

सहर थी चश्मे फसूं साज़ के मिलते ही नज़र
मैंने पहलू में जो देखा तो दिलेज़ार न था

एक होने से रकीबो के हुआ क्या क्या कुछ
गम न था रस्क न था दाग न था खार न था

एक ही जलबा दिखा के मुझे धोके में न डाल
दिल कहे यार ही था मैं कहूं यार न था

जाल उस ज़ुल्फ़े परिसँ ने बिछाया ए दिल
ले सम्बल फिर ये न कहना के खबर दार न था

दिल का सौदा और उस अगमाज़ से और ऐसी जगह
दाग वो अंजुमन-नाज़ थे बाजार न था

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Hindi Ghazal Ghazab kiya Tere Wade Pe etbaar kiya

गज़ब किया तेरे वादे पे एतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया

किस तरहे जो न उस बात ने एतबार किया
मेरी वफ़ा ने खूब वफ़ा ने खूब शर्म शार किया

हँसा हँसा के शबे वसल आस्क बार किया
तसलिया दे दे कर मुझे आस्क बार किया

ये किस ने जलवा हमरे सरे मज़ार किया
के दिल से शोर उठा हाय बे करार किया

सुना है टेग को कातिल ने आबेदार किया
अगर ये सच है तो बे सूबा हम पे वार किया

न आये राहा पे वो परेशान बे सुमार किया
सब वसल भी तो मैंने इंतज़ार किया

तुझे तो वदए दिद्दार हम से करना था
ये क्या किया जहाँ को उम्मीद वार किया

ये दिल ताब कहा है के हो माले आदेश
इन्ही ने वादा किया उसने एतबार किया

कहा का सबर के दम पर है बनेगी ज़ालिम
बे तंग आये तो हाले दिल आस्क बार किया

तड़प फिर ए दिल नादाँ के गैर कहते है
आखिर कुछ न बनी सबर इख्तियार किया

मिले जो यार की शोखी से उसकी बे-चैनी
तमाम रात दिल-ए-मुज़्तरिब को प्यार किया

भुला भुला के जताया है उनको राजे निहा
छुपा छुपा के मोहब्बत को आस्क बार किया

हम एहसे माहबे नज़ारा न थे जो होश आता
मगर तुम्हारे तगाफुल ने होशयार किया

हमारे सीने में कुछ रहे गयी थी आतिशे हिजर
शबे वसल भी उसको न हम किनार किया

तेरी निगहा के तसब्बुर में हम ने ए क़ातिल
लगा लगा के गले से छुरी को प्यार किया

न पूछो दिल की हक़ीक़त मगर ये कहते है
वो बेकरार रहे जिसने बे करार किया

बनेगा गा महेर क़यामत भी एक खाल सीहा
जो चेरा दाग सीहा रोने आस कार किया

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Game isk rahe gaya hai game justaju ban kar Hindi ghazal

ग़मे इश्क रहे गया है, ग़मे जुस्तजू में ढलकर
वो नज़र से छुप गए है, मेरी ज़िन्दगी बदल कर

तेरी गुफ्तगू को नासे दिले गम-ज़दा से जल कर
अभी तक तो सुन रहा था मगर अब ज़रा संभल कर

न मिला सुरागे मंज़िल कहीं उम्र भर किसी का
नज़र आ गयी है मंज़िल कहीं दो कदम ही चल कर

ग़मे उम्र मुख़्तसर से अभी बे खबर है कलियाँ
न चमन में फेक देना किसी फूल को मसल कर

है किस के मुन्तज़िर हम मगर ए उम्मेदे मबहम
कहीं वक्त रहे न जाये यूही करबटें बदल कर

मेरी तेज़-गामियूं से नहीं वर्क को भी निस्बत
कहीं खो न जाये दुनया मेरे साथ साथ चल कर

कभी यक-बा-यक तबज्जो कभी दफ़अतन तगाफुल
मुझे आज़मा रहा है कोई रुख बदल बदल कर

हैं शकील ज़िन्दगी में ये जो बुसअतें नुमायाँ
इन्ही बुसअतें से पैदा कोई आलमे ग़ज़ल कर

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Azal ke din jinhe le kar chale the teri mahfil se

अज़ल के दिन जिन्हे ले कर चले थे तेरी महफ़िल से
वो शोला आज तक लिपटे हुआ है दामाने दिल से

मुझे अब खोफ ही क्या हिजर में तन्हाई दिल से
हज़ारो महफिले ले कर उठा हु तेरी महफ़िल से

ये आलम है हुजुमे शोक में बे ताबी दिल से
के मंज़िल पर पहुंच कर भी उडा जाता हु मंज़िल से

फलक पर दुबे जाते है तारे भी शबे फुरकत
मगर निस्बत कहा उनको मेरे दुबे हुए दिल से

निगाहे कैस की उठी है जोशे कैफ मस्ती में
ज़रा होशयार रहना सारबा लैला की मैफिल में

समझ कर फूकना उस को ज़रा ए दागे न कामी
बहुत से घर भी है आबाद उस उजड़े हुए दिल में

मोहब्बत में कदम रखते ही गुम होना पड़ा मुझको
निकल आये हज़ारो मंज़िले एक ही मंज़िल से

क़यामत क्या,कहाँ का हश्र,क्या दैर,क्या काबा
ये सब हंगामा बरपा है, मेरे एक मुज़्तरिब दिल

बयां क्या हो यहाँ की मुस्किले बस मुक्तसर ये है
वही अच्छे है, कुछ जो जिस कदर है दूर मंज़िल से

हुजुमे यास एसा कुछ नज़र नहीं मुझको
बाफुरे शौक़ में आगे बढ़ा जाता हु मंज़िल से

मोहब्बत में ज़रूरत ही तलाशे गैर की क्या थी
अगर हम ढूंढ़ते नस्तर भी मिल जाता रगे गुल से

बदन से जान भी हो जाएगी रुखसत जिगर लेकिन
न जायेगा ख़याले हज़रते असगर मेरे दिल से

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Mareze gam ke saharo koi to baat karo Hindi-ghazal

मरीज़े गम के सहारो, कोई तो बात करो
उदास चाँद सितारों, कोई तो बात करो

कहा है, डूब चूका अब तो डूब ने वाला
सिकिस्ता दिल से किनारो, कोई तो बात करो

मेरे नसीब को बर्बादियों से निस्बत है
लूटी हुयी सी बहरो,कोई तो बात करो

कहाँ गया वो तुम्हारा बुलंदी-यो का जुनूँ
भुजे भुजे से शरारो कोई तो बात करो

इसी तरह से अजब क्या जो कुछ सुकून मिले
गेम फ़िराक के मारो कोई तो बात करो

तुम्हारा गम भी मिटाती है मस्तियाँ के नहीं
शराबे नाब के मारो कोई तो बात करो

तुम्हारी खाक उडाता नहीं सकेब तो क्या
उदास रहे गुज़र कोई तो बात करो

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Hindi Ghazal mansob the jo log meri zindagi ke sath Hindi ghazal

मंसूब थे जो लोग, मेरी ज़िन्दगी के साथ
अक्सर वही मिले है, बड़ी बे रूखी के साथ

यूँ तो मैं हस पड़ा हूँ, तुम्हारे लिए मगर
कितने सितारे टूट पड़े, एक हसी के साथ

फुर्सत मिले तो अपना गिरेबान भी देख ले
ए दोस्त यूँ न खेल मेरी ज़िन्दगी के साथ

मजबूरियो की बात चली है तो मय कहा
हम ने पिया ज़हर भी अक्सर खुसी के साथ

चेरे बदल बदल कर मिल रहे है लोग
इतना बुरा सुलूक मेरी सादगी के साथ

एक सज्दए खुलूस की कीमत फ़िज़ाए खुल्द
या रब न कर मज़ाक मेरी बंदगी के साथ

मोसिन करम लय भी हो जिसमे खुलूस भी
मुझको ग़ज़ब का प्यार है उसी दुश्मनी के साथ

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hindi shayri ey khuda aaj ye fasla kar de

अय खुदा आज ये फैसला कर दे,
मुझे उसका या उसे मेरा कर दे
बहुत दुख सहे है उसकी खातिर,
अब कोई खुसी मेरे मुकद्दर कर दे,
या ख़तम कर ये जिंदिगानी,
और मुझे फ़ना कर दे

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