Poetry कहानी हिन्दी में गद्य लेखन की एक विधा है। उन्नीसवीं सदी में गद्य में एक नई विधा का विकास हुआ जिसे कहानी के नाम से जाना गया। बंगला में इसे गल्प कहा जाता है।

फ़नकार के काम आई न कुछ दीदा-वरी भी
करना पड़ी शहज़ादों को दरयोज़ा-गरी भी

इक सिलसिला-ए-दार-ओ-रसन फैला हुआ है
मिंजुमला ख़ताओं के है साहब-नज़री भी

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जिन हाथों ने फाड़े न कभी जेब ओ गरेबाँ
उन हाथों से हो सकती नहीं बख़िया-गरी भी

राचीनकाल में सदियों तक प्रचलित वीरों तथा राजाओं के शौर्य, Poetry  प्रेम, न्याय, ज्ञान, वैराग्य, साहस, समुद्री यात्रा, अगम्य पर्वतीय प्रदेशों में प्राणियों का अस्तित्व आदि की कथाएँ, जिनकी कथानक घटना प्रधान हुआ करती थीं, भी कहानी के ही रूप हैं।

उन से तो बहर तौर हर इक राहज़न अच्छा
जो राहज़नी करते हैं और राहबरी भी

जब इल्म हो सूरत-गर-ए-मश्शाता-ए-दोज़ख़
फ़िरदौस है आदम के लिए बे-ख़बरी भी

जब सर से गुज़र जाता है तलवार का पानी
सर थाम के रह जाती है बेदाद-गरी भी

‘वामिक़’ तुझे यारों से जो बेगाना बना दे
इक साग़र-ए-बे-कैफ़ है वो नामवरी भी

“कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।” हिन्दी के लेखकों में प्रेमचंद पहले व्यक्ति हैं

गूँजता था जिस से कोह-ए-बे-सुतून ओ दश्त-ए-नज्द
गोश-ए-जाँ को फिर उन्हीं नालों का महरम कीजिए

हुस्न-ए-बे-परवा को दे कर दावत-ए-लुत्फ़-ओ-करम
इश्क़ के ज़ेर-ए-नगीं फिर हर दो आलम कीजिए

दौर-ए-पेशीं की तरह फिर डालिए सीने में ज़ख़्म
ज़ख़्म की लज़्ज़त से फिर तय्यार मरहम कीजिए

सुब्ह से ता शाम रहिए क़िस्सा-ए-आरिज़ में गुम
शाम से ता सुब्ह ज़िक्र-ए-ज़ुल्फ़-ए-बरहम कीजिए

दिन के हंगामों को कीजिए दिल के सन्नाटे में ग़र्क़
रात की ख़ामोशियों को वक़्फ़-ए-मातम कीजिए