Aa gaye fer tere armaan mitane ko

आ गए फिर तिरे अरमान मिटाने हम को
दिल से पहले ये लगा देंगे ठिकाने हम को

सर उठाने न दिया हश्र के दिन भी ज़ालिम
कुछ तिरे ख़ौफ़ ने कुछ अपनी वफ़ा ने हम को

कुछ तो है ज़िक्र से दुश्मन के जो शरमाते हैं
वहम में डाल दिया उन की हया ने हम को

ज़ुल्म का शौक़ भी है शर्म भी है ख़ौफ़ भी है
ख़्वाब में छुप के वो आते हैं सताने हम को

चार दाग़ों पे न एहसान जताओ इतना
कौन से बख़्श दिए तुम ने ख़ज़ाने हम को

बात करने की कहाँ वस्ल में फ़ुर्सत ‘बेख़ुद’
वो तो देते ही नहीं होश में आने हम को

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Aisa bana diya mujhe

ऐसा बना दिया तुझे क़ुदरत ख़ुदा की है
किस हुस्न का है हुस्न अदा किस अदा की है

चश्म-ए-सियाह-ए-यार से साज़िश हया की है
लैला के साथ में ये सहेली बला की है

तस्वीर क्यूँ दिखाएँ तुम्हें नाम क्यूँ बताएँ
लाए हैं हम कहीं से किसी बेवफ़ा की है

अंदाज़ मुझ से और हैं दुश्मन से और ढंग
पहचान मुझ को अपनी पराई क़ज़ा की है

मग़रूर क्यूँ हैं आप जवानी पर इस क़दर
ये मेरे नाम की है ये मेरी दुआ की है

दुश्मन के घर से चल के दिखा दो जुदा जुदा
ये बाँकपन की चाल ये नाज़-ओ-अदा की है

रह रह के ले रही है मिरे दिल में चुटकियाँ
फिसली हुई गिरह तिरे बंद-ए-क़बा की है

गर्दन मुड़ी निगाह लड़ी बात कुछ न की
शोख़ी तो ख़ैर आप की तम्कीं बला की है

होती है रोज़ बादा-कशों की दुआ क़ुबूल
ऐ मोहतसिब ये शान-ए-करीमी ख़ुदा की है

जितने गिले थे उन के वो सब दिल से धुल गए
झेपी हुई निगाह तलाफ़ी जफ़ा की है

छुपता है ख़ून भी कहीं मुट्ठी तो खोलिए
रंगत यही हिना की यही बू हिना की है

कह दो कि बे-वज़ू न छुए उस को मोहतसिब
बोतल में बंद रूह किसी पारसा की है

मैं इम्तिहान दे के उन्हें क्यूँ न मर गया
अब ग़ैर से भी उन को तमन्ना वफ़ा की है

देखो तो जा के हज़रत-ए-‘बेख़ुद’ न हूँ कहीं
दावत शराब-ख़ाने में इक पारसा की है

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Mohabbat me Asar paida kar

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर
जो इधर दिल में है या रब वो उधर पैदा कर

दूद-ए-दिल इश्क़ में इतना तो असर पैदा कर
सर कटे शम्अ की मानिंद तो सर पैदा कर

फिर हमारा दिल-ए-गुम-गश्ता भी मिल जाएगा
पहले तू अपना दहन अपनी कमर पैदा कर

काम लेने हैं मोहब्बत में बहुत से या रब
और दिल दे हमें इक और जिगर पैदा कर

थम ज़रा ऐ अदम-आबाद के जाने वाले
रह के दुनिया में अभी ज़ाद-ए-सफ़र पैदा कर

झूट जब बोलते हैं वो तो दुआ होती है
या इलाही मिरी बातों में असर पैदा कर

आईना देखना इस हुस्न पे आसान नहीं
पेश-तर आँख मिरी मेरी नज़र पैदा कर

सुब्ह-ए-फ़ुर्क़त तो क़यामत की सहर है या रब
अपने बंदों के लिए और सहर पैदा कर

मुझ को रोता हुआ देखें तो झुलस जाएँ रक़ीब
आग पानी में भी ऐ सोज़-ए-जिगर पैदा कर

मिट के भी दूरी-ए-गुलशन नहीं भाती या रब
अपनी क़ुदरत से मिरी ख़ाक में पर पैदा कर

शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं
रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर

दिन निकलने को है राहत से गुज़र जाने दे
रूठ कर तू न क़यामत की सहर पैदा कर

हम ने देखा है कि मिल जाते हैं लड़ने वाले
सुल्ह की ख़ू भी तो ऐ बानी-ए-शर पैदा कर

मुझ से घर आने के वादे पर बिगड़ कर बोले
कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर

मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की
तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर

क्या क़यामत में भी पर्दा न उठेगा रुख़ से
अब तो मेरी शब-ए-यलदा की सहर पैदा कर

देखना खेल नहीं जल्वा-ए-दीदार तिरा
पहले मूसा सा कोई अहल-ए-नज़र पैदा कर

दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का है मक़ाम
राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफ़र पैदा कर

ज़ोफ़ का हुक्म ये है होंट न हिलने पाएँ
दिल ये कहता है कि नाले में असर पैदा कर

नाले ‘बेख़ुद’ के क़यामत हैं तुझे याद रहे
ज़ुल्म करना है तो पत्थर का जिगर पैदा कर

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Jala ke mishan-e-jaha hum

जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले

दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं
अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले

हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही
वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले

सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले

हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक
ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले

बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा
अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले

फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा
हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले

क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ
ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले

भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ ‘मजरूह’
बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले

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Jane kis ki thi sada yaad nhi

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं
हम हुए कैसे जुदा याद नहीं

एक शोला सा उठा था दिल में
जाने किस की थी सदा याद नहीं

एक नग़्मा सा सुना था मैं ने
कौन था शोला-नवा याद नहीं

रोज़ दोहराते थे अफ़्साना-ए-दिल
किस तरह भूल गया याद नहीं

इक फ़क़त याद है जाना उन का
और कुछ इस के सिवा याद नहीं

तू मिरी जान-ए-तमन्ना थी कभी
ऐ मिरी जान-ए-वफ़ा याद नहीं

हम भी थे तेरी तरह आवारा
क्या तुझे बाद-ए-सबा याद नहीं

हम भी थे तेरी नवाओं में शरीक
ताइर-ए-नग़मा-सरा याद नहीं

हाल-ए-दिल कैसे ‘तबस्सुम’ हो बयाँ
जाने क्या याद है क्या याद नहीं

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Ameer Khusro Farsi Kalam

ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न-दारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ

शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

यकायक अज़ दिल दो चश्म जादू ब-सद-फ़रेबम ब-बुर्द तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियाँ

चूँ शम-ए-सोज़ाँ चूँ ज़र्रा हैराँ ज़े-मेहर-ए-आँ-मह ब-गश्तम आख़िर
न नींद नैनाँ न अंग चैनाँ न आप आवे न भेजे पतियाँ

ब-हक़्क़-ए-आँ-मह कि रोज़-ए-महशर ब-दाद मा रा फ़रेब ‘ख़ुसरव’
सपीत मन के दुराय राखूँ जो जाए पाऊँ पिया की खतियाँ

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Ye kaisi kashma-kash hai jindagi me

ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में
किसी को ढूँडते हैं हम किसी में

जो खो जाता है मिल कर ज़िंदगी में
ग़ज़ल है नाम उस का शाएरी में

निकल आते हैं आँसू हँसते हँसते
ये किस ग़म की कसक है हर ख़ुशी में

कहीं चेहरा कहीं आँखें कहीं लब
हमेशा एक मिलता है कई में

चमकती है अंधेरों में ख़मोशी
सितारे टूटते हैं रात ही में

सुलगती रेत में पानी कहाँ था
कोई बादल छुपा था तिश्नगी में

बहुत मुश्किल है बंजारा-मिज़ाजी
सलीक़ा चाहिए आवारगी में

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Is baat se nhi matlab koi intiha hogi

इस बात की नहीं है कोई इंतिहा न पूछ
ऐ मुद्दआ-ए-ख़ल्क़ मिरा मुद्दआ न पूछ

क्या कह के फूल बनती हैं कलियाँ गुलाब की
ये राज़ मुझ से बुलबुल-ए-शीरीं-नवा न पूछ

जितने गदा-नवाज़ थे कब के गुज़र चुके
अब क्यूँ बिछाए बैठे हैं हम बोरिया न पूछ

पेश-ए-नज़र है पस्त-ओ-बुलंद-ए-रह-ए-जुनूँ
हम बे-ख़ुदों से क़िस्सा-ए-अर्ज़-ओ-समा न पूछ

सुम्बुल से वास्ता न चमन से मुनासिबत
इस ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बार का हाल ऐ सबा न पूछ

सद महफ़िल-ए-नशात है इक शेर-ए-दिल-नशीं
इस बर्बत-ए-सुख़न में है किस की सदा न पूछ

कर रहम मेरे जेब ओ गरेबाँ पे हम-नफ़स
चलती है कू-ए-यार में क्यूँकर हवा न पूछ

रहता नहीं है दहर में जब कोई आसरा
उस वक़्त आदमी पे गुज़रती है क्या न पूछ

हर साँस में है चश्मा-ए-हैवान-ओ-सलसबील
फिर भी मैं तिश्ना-काम हूँ ये माजरा न पूछ

बंदा तिरे वजूद का मुनकिर नहीं मगर
दुनिया ने क्या दिए हैं सबक़ ऐ ख़ुदा न पूछ

क्यूँ ‘जोश’ राज़-ए-दोस्त की करता है जुस्तुजू
कह दो कोई कि शाह का हाल ऐ गदा न पूछ

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Kon yaad aaya ye bahar-e-kaha se aai hai

कौन याद आया ये महकारें कहाँ से आ गईं
दश्त में ख़ुशबू की बौछारें कहाँ से आ गईं

कैसी शब है एक इक करवट पे कट जाता है जिस्म
मेरे बिस्तर में ये तलवारें कहाँ से आ गईं

ख़्वाब शायद फिर हुआ आँखों में कोई संगसार
ज़ेर-ए-मिज़्गाँ ख़ून की धारें कहाँ से आ गईं

शायद अब तक मुझ में कोई घोंसला आबाद है
घर में ये चिड़ियों की चहकारें कहाँ से आ गईं

साथ है मिलना अगर चाहूँ तो मिलता भी नहीं
एक घर में इतनी दीवारें कहाँ से आ गईं

रख दिया किस ने मिरे शाने पे अपना गर्म हाथ
मुझ शिकस्ता-पा में रफ़्तारें कहाँ से आ गईं

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ye baat ye tabassum ye naaz ye nigahe

ये बात ये तबस्सुम ये नाज़ ये निगाहें
आख़िर तुम्हीं बताओ क्यूँकर न तुम को चाहें

अब सर उठा के मैं ने शिकवों से हात उठाया
मर जाऊँगा सितमगर नीची न कर निगाहें

कुछ गुल ही से नहीं है रूह-ए-नुमू को रग़बत
गर्दन में ख़ार की भी डाले हुए है बाँहें

अल्लाह री दिल-फ़रेबी जल्वों के बाँकपन की
महफ़िल में वो जो आए कज हो गईं कुलाहें

ये बज़्म ‘जोश’ किस के जल्वों की रहगुज़र है
हर ज़र्रे में हैं ग़लताँ उठती हुई निगाहें

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