tera wasl mujhko firak hai

तिरा वस्ल है मुझे बे-ख़ुदी तिरा हिज्र है मुझे आगही
तिरा वस्ल मुझ को फ़िराक़ है तिरा हिज्र मुझ को विसाल है

मैं हूँ दर पर उस के पड़ा हुआ मुझे और चाहिए क्या भला
मुझे बे-परी का हो क्या गला मिरी बे-परी पर-ओ-बाल है

वही मैं हूँ और वही ज़िंदगी वही सुब्ह ओ शाम की सर ख़ुशी
वही मेरा हुस्न-ए-ख़याल है वही उन की शान-ए-जमाल है

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Nazar me dhal ke

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़्साने
ये और बात है दुनिया नज़र न पहचाने

वो बज़्म देखी है मेरी निगाह ने कि जहाँ
बग़ैर शम्अ’ भी जलते रहे हैं परवाने

ये क्या बहार का जोबन ये क्या नशात का रंग
फ़सुर्दा मय-कदे वाले उदास मय-ख़ाने

मिरे नदीम तिरी चश्म-ए-इल्तिफ़ात की ख़ैर
बिगड़ बिगड़ के सँवरते गए हैं अफ़्साने

ये किस की चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़ का करिश्मा है
कि टूट कर भी सलामत हैं दिल के बुत-ख़ाने

निगाह-ए-नाज़ में दिल-सोज़ी-ए-नियाज़ कहाँ
ये आश्ना-ए-नज़र हैं दिलों के बेगाने

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