Jala ke mishan-e-jaha hum

जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले

दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं
अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले

हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही
वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले

सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले

हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक
ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले

बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा
अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले

फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा
हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले

क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ
ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले

भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ ‘मजरूह’
बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले

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Jane kis ki thi sada yaad nhi

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं
हम हुए कैसे जुदा याद नहीं

एक शोला सा उठा था दिल में
जाने किस की थी सदा याद नहीं

एक नग़्मा सा सुना था मैं ने
कौन था शोला-नवा याद नहीं

रोज़ दोहराते थे अफ़्साना-ए-दिल
किस तरह भूल गया याद नहीं

इक फ़क़त याद है जाना उन का
और कुछ इस के सिवा याद नहीं

तू मिरी जान-ए-तमन्ना थी कभी
ऐ मिरी जान-ए-वफ़ा याद नहीं

हम भी थे तेरी तरह आवारा
क्या तुझे बाद-ए-सबा याद नहीं

हम भी थे तेरी नवाओं में शरीक
ताइर-ए-नग़मा-सरा याद नहीं

हाल-ए-दिल कैसे ‘तबस्सुम’ हो बयाँ
जाने क्या याद है क्या याद नहीं

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Ye kaisi kashma-kash hai jindagi me

ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में
किसी को ढूँडते हैं हम किसी में

जो खो जाता है मिल कर ज़िंदगी में
ग़ज़ल है नाम उस का शाएरी में

निकल आते हैं आँसू हँसते हँसते
ये किस ग़म की कसक है हर ख़ुशी में

कहीं चेहरा कहीं आँखें कहीं लब
हमेशा एक मिलता है कई में

चमकती है अंधेरों में ख़मोशी
सितारे टूटते हैं रात ही में

सुलगती रेत में पानी कहाँ था
कोई बादल छुपा था तिश्नगी में

बहुत मुश्किल है बंजारा-मिज़ाजी
सलीक़ा चाहिए आवारगी में

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Is baat se nhi matlab koi intiha hogi

इस बात की नहीं है कोई इंतिहा न पूछ
ऐ मुद्दआ-ए-ख़ल्क़ मिरा मुद्दआ न पूछ

क्या कह के फूल बनती हैं कलियाँ गुलाब की
ये राज़ मुझ से बुलबुल-ए-शीरीं-नवा न पूछ

जितने गदा-नवाज़ थे कब के गुज़र चुके
अब क्यूँ बिछाए बैठे हैं हम बोरिया न पूछ

पेश-ए-नज़र है पस्त-ओ-बुलंद-ए-रह-ए-जुनूँ
हम बे-ख़ुदों से क़िस्सा-ए-अर्ज़-ओ-समा न पूछ

सुम्बुल से वास्ता न चमन से मुनासिबत
इस ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बार का हाल ऐ सबा न पूछ

सद महफ़िल-ए-नशात है इक शेर-ए-दिल-नशीं
इस बर्बत-ए-सुख़न में है किस की सदा न पूछ

कर रहम मेरे जेब ओ गरेबाँ पे हम-नफ़स
चलती है कू-ए-यार में क्यूँकर हवा न पूछ

रहता नहीं है दहर में जब कोई आसरा
उस वक़्त आदमी पे गुज़रती है क्या न पूछ

हर साँस में है चश्मा-ए-हैवान-ओ-सलसबील
फिर भी मैं तिश्ना-काम हूँ ये माजरा न पूछ

बंदा तिरे वजूद का मुनकिर नहीं मगर
दुनिया ने क्या दिए हैं सबक़ ऐ ख़ुदा न पूछ

क्यूँ ‘जोश’ राज़-ए-दोस्त की करता है जुस्तुजू
कह दो कोई कि शाह का हाल ऐ गदा न पूछ

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Kon yaad aaya ye bahar-e-kaha se aai hai

कौन याद आया ये महकारें कहाँ से आ गईं
दश्त में ख़ुशबू की बौछारें कहाँ से आ गईं

कैसी शब है एक इक करवट पे कट जाता है जिस्म
मेरे बिस्तर में ये तलवारें कहाँ से आ गईं

ख़्वाब शायद फिर हुआ आँखों में कोई संगसार
ज़ेर-ए-मिज़्गाँ ख़ून की धारें कहाँ से आ गईं

शायद अब तक मुझ में कोई घोंसला आबाद है
घर में ये चिड़ियों की चहकारें कहाँ से आ गईं

साथ है मिलना अगर चाहूँ तो मिलता भी नहीं
एक घर में इतनी दीवारें कहाँ से आ गईं

रख दिया किस ने मिरे शाने पे अपना गर्म हाथ
मुझ शिकस्ता-पा में रफ़्तारें कहाँ से आ गईं

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ye baat ye tabassum ye naaz ye nigahe

ये बात ये तबस्सुम ये नाज़ ये निगाहें
आख़िर तुम्हीं बताओ क्यूँकर न तुम को चाहें

अब सर उठा के मैं ने शिकवों से हात उठाया
मर जाऊँगा सितमगर नीची न कर निगाहें

कुछ गुल ही से नहीं है रूह-ए-नुमू को रग़बत
गर्दन में ख़ार की भी डाले हुए है बाँहें

अल्लाह री दिल-फ़रेबी जल्वों के बाँकपन की
महफ़िल में वो जो आए कज हो गईं कुलाहें

ये बज़्म ‘जोश’ किस के जल्वों की रहगुज़र है
हर ज़र्रे में हैं ग़लताँ उठती हुई निगाहें

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kya kre kyu rahe duniya me yaro

क्या करें क्यूँ-कर रहें दुनिया में यारो हम ख़ुशी
हम को रहने ही नहीं देता है हरगिज़ ग़म ख़ुशी

हम तो अपने दर्द और ग़म में निपट महज़ूज़ हैं
हम को क्या इस बात से रहता है गर आलम ख़ुशी

ऐ अज़ीज़ो इस ख़ुशी को कुइ ख़ुशी नहीं पहुँचती
आशिक़ और माशूक़ जब होते हैं मिल बाहम ख़ुशी

ऐ फ़लक जिस जिस तरह का ग़म तू चाहे मुझ को दे
मैं कभी नालाँ न हूँ हरगिज़ रहूँ हर दम ख़ुशी

यार है मय है चमन है क्यूँ न हम ख़ुश-वक़्त हों
इस तरह की होगी ऐ ‘ताबाँ’ किसी को कम ख़ुशी

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Surat se iss ki behtar surat nhi hai koi

सूरत से इस की बेहतर सूरत नहीं है कोई
दीदार-ए-यार सी भी दौलत नहीं है कोई

आँखों को खोल अगर तू दीदार का है भूका
चौदह तबक़ से बाहर नेमत नहीं है कोई

साबित तिरे दहन को क्या मंतिक़ी करेंगे
ऐसी दलील ऐसी हुज्जत नहीं है कोई

ये क्या समझ के कड़वे होते हैं आप हम से
पी जाएगा किसी को शर्बत नहीं है कोई

मैं ने कहा कभी तो तशरीफ़ लाओ बोले
म’अज़ूर रखिए वक़्त-ए-फ़ुर्सत नहीं है कोई

हम क्या कहें किसी से क्या है तरीक़ अपना
मज़हब नहीं है कोई मिल्लत नहीं है कोई

दिल ले के जान के भी साइल जो हो तो हाज़िर
हाज़िर जो कुछ है उस में हुज्जत नहीं है कोई

हम शायरों का हल्क़ा हल्क़ा है आरिफ़ों का
ना-आश्ना-ए-मअ’नी सूरत नहीं है कोई

दीवानों से है अपने ये क़ौल उस परी का
ख़ाकी ओ आतिशी से निस्बत नहीं है कोई

हज़्दा हज़ार आलम दम-भर रहा है तेरा
तुझ को न चाहे ऐसी ख़िल्क़त नहीं है कोई

नाज़ाँ न हुस्न पर हो मेहमाँ है चार दिन का
बे-ए’तिबार ऐसी दौलत नहीं है कोई

जाँ से अज़ीज़ दिल को रखता हूँ आदमी हूँ
क्यूँ-कर कहूँ मैं मुझ को हसरत नहीं है कोई

यूँ बद कहा करो तुम यूँ माल कुछ न समझो
हम सा भी ख़ैर-ख़्वाह-ए-दौलत नहीं है कोई

मैं पाँच वक़्त सज्दा करता हूँ इस सनम को
मुझ को भी ऐसी-वैसी ख़िदमत नहीं है कोई

मा-ओ-शुमा कह-ओ-मह करता है ज़िक्र तेरा
इस दास्ताँ से ख़ाली सोहबत नहीं है कोई

शहर-ए-बुताँ है ‘आतिश’ अल्लाह को करो याद
किस को पुकारते हो हज़रत नहीं है कोई

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Teri yaad hai bhaut jaruri mere liye

वही प्यास है वही दश्त है वही घराना है
मश्कीज़े से तीर का रिश्ता बहुत पुराना है

सुब्ह सवेरे रन पड़ना है और घमसान का रन
रातों रात चला जाए जिस जिस को जाना है

एक चराग़ और एक किताब और एक उमीद-ए-असासा
उस के बा’द तो जो कुछ है वो सब अफ़्साना है

दरिया पर क़ब्ज़ा था जिस का उस की प्यास अज़ाब
जिस की ढालें चमक रही थीं वही निशाना है

कासा-ए-शाम में सूरज का सर और आवाज़-ए-अज़ाँ
और आवाज़-ए-अज़ाँ कहती है फ़र्ज़ निभाना है

सब कहते हैं और कोई दिन ये हंगामा-ए-दहर
दिल कहता है एक मुसाफ़िर और भी आना है

एक जज़ीरा उस के आगे पीछे सात समुंदर
सात समुंदर पार सुना है एक ख़ज़ाना है

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Hamre hath me jab koi jaam aya hai

हमारे हाथ में जब कोई जाम आया है
तो लब पे कितने ही प्यासों का नाम आया है

कहाँ का नूर यहाँ रात हो गई गहरी
मिरा चराग़ अँधेरों के काम आया है

ये क्या ग़ज़ब है जो कल तक सितम-रसीदा थे
सितमगरों में अब उन का भी नाम आया है

तमाम उम्र कटी उस की जुस्तुजू करते
बड़े दिनों में ये तर्ज़-ए-कलाम आया है

बढ़ूँ तो राख बनूँ मुड़ चलूँ तो पथरा जाऊँ
सफ़र में शौक़ के नाज़ुक मक़ाम आया है

ख़बर भी है मिरे गुलशन के लाला ओ गुल को
मिरा लहू भी बहारों के काम आया है

वो सर-फिरे जो निगह-दारी-ए-जुनूँ में रहे
‘सुरूर’ उन में हमारा भी नाम आया है

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