mere seene se tera teer nikla

मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला
दहान-ए-ज़ख़्म से ख़ूँ हो के हर्फ़-ए-आरज़ू निकला

मिरा घर तेरी मंज़िल-गाह हो ऐसे कहाँ तालए
ख़ुदा जाने किधर का चाँद आज ऐ माह-रू निकला

फिरा गर आसमाँ तो शौक़ में तेरे है सरगर्दां
अगर ख़ुर्शीद निकला तेरा गर्म-ए-जुस्तुजू निकला

मय-ए-इशरत तलब करते थे नाहक़ आसमाँ से हम
वो था लबरेज़-ए-ग़म इस ख़ुम-कदे से जो सुबू निकला

तिरे आते ही आते काम आख़िर हो गया मेरा
रही हसरत कि दम मेरा न तेरे रू-ब-रू निकला

कहीं तुझ को न पाया गरचे हम ने इक जहाँ ढूँडा
फिर आख़िर दिल ही में देखा बग़ल ही में से तू निकला

ख़जिल अपने गुनाहों से हूँ मैं याँ तक कि जब रोया
तो जो आँसू मिरी आँखों से निकला सुर्ख़-रू निकला

घिसे सब नाख़ुन-ए-तदबीर और टूटी सर-ए-सोज़ान
मगर था दिल में जो काँटा न हरगिज़ वो कभू निकला

उसे अय्यार पाया यार समझे ‘ज़ौक़’ हम जिस को
जिसे याँ दोस्त अपना हम ने जाना वो उदू निकला

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koi mohabbat na kre to kya kare

कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे
और जो ये तंग करें मुँह से शिकायत न करे

इश्क़ के दाग़ को दिल मोहर-ए-नबूवत समझा
डर है काफ़िर कहीं दावा-ए-नबूवत न करे

है जराहत का मिरी सौदा-ए-अल्मास इलाज
फ़ाएदा उस को कभी संग-ए-जराहत न करे

हर क़दम पर मिरे अश्कों से रवाँ है दरिया
क्या करे जादा अगर तर्क-ए-रिफ़ाक़त न करे

आज तक ख़ूँ से मिरे तर है ज़बान-ए-ख़ंजर
क्या करे जब कि तलब कोई शहादत न करे

है ये इंसाँ बड़े उस्ताद का शागिर्द-ए-रशीद
कर सके कौन अगर ये भी ख़िलाफ़त न करे

बिन जले शम्अ के परवाना नहीं जल सकता
क्या बढ़े इश्क़ अगर हुस्न ही सब्क़त न करे

फिर चला मक़्तल-ए-उश्शाक़ की जानिब क़ातिल
सर पे बरपा कहीं कुश्तों के क़यामत न करे

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Agaz hua hai ulfat ka

आग़ाज़ हुआ है उल्फ़त का अब देखिए क्या क्या होना है
या सारी उम्र की राहत है या सारी उम्र का रोना है

शायद था बयाज़-ए-शब में कहीं इक्सीर का नुस्ख़ा भी कोई
ऐ सुब्ह ये तेरी झोली है या दुनिया भर का सोना है

तदबीर के हाथों से गोया तक़दीर का पर्दा उठता है
या कुछ भी नहीं या सब कुछ है या मिटी है या सोना है

टूटे जो ये बंद-ए-हयात कहीं इस शोर-ओ-शर से नजात मिले
माना कि वो दुनिया ऐ ‘अफ़सर’ सिर्फ़ एक लहद का कोना है

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ashiq ki kya khoob katti hai rate

आशिक़ की भी कटती हैं क्या ख़ूब तरह रातें
दो-चार घड़ी रोना दो-चार घड़ी बातें

क़ुर्बां हूँ मुझे जिस दम याद आती हैं वो बातें
क्या दिन वो मुबारक थे क्या ख़ूब थीं वो रातें

औरों से छुटे दिलबर दिल-दार होवे मेरा
बर-हक़ हैं अगर पैरव कुछ तुम में करामातें

कल लड़ गईं कूचे में आँखों से मिरी आँखियाँ
कुछ ज़ोर ही आपस में दो दो हुईं समघातें

कश्मीर सी जागह में ना-शुक्र न रह ज़ाहिद
जन्नत में तू ऐ गीदी मारे है ये क्यूँ लातें

इस इश्क़ के कूचे में ज़ाहिद तू सँभल चलना
कुछ पेश न जावेंगी याँ तेरी मुनाजातें

उस रोज़ मियाँ मिल कर नज़रों को चुराते थे
तुझ याद में ही साजन करते हैं मदारातें

‘सौदा’ को अगर पूछो अहवाल है ये उस का
दो-चार घड़ी रोना दो-चार घड़ी बातें

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jab yaar ne dekh parda utha kar

जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे
तब मैं ने अपने दिल में लाखों ख़याल बाँधे

दो दिन में हम तो रीझे ऐ वाए हाल उन का
गुज़रे हैं जिन के दिल को याँ माह-ओ-साल बाँधे

तार-ए-निगह में उस के क्यूँकर फँसे न ये दिल
आँखों ने जिस के लाखों वहशी ग़ज़ाल बाँधे

जो कुछ है रंग उस का सो है नज़र में अपनी
गो जामा ज़र्द पहने या चीरा लाल बाँधे

तेरे ही सामने कुछ बहके है मेरा नाला
वर्ना निशाने हम ने मारे हैं बाल बाँधे

बोसे की तो है ख़्वाहिश पर कहिए क्यूँकि उस से
जिस का मिज़ाज लब पर हर्फ़-ए-सवाल बाँधे

मारोगे किस को जी से किस पर कमर कसी है
फिरते हो क्यूँ प्यारे तलवार ढाल बाँधे

दो-चार शेर आगे उस के पढ़े तो बोला
मज़मूँ ये तू ने अपने क्या हस्ब-ए-हाल बाँधे

‘सौदा’ जो उन ने बाँधा ज़ुल्फ़ों में दिल सज़ा है
शेरों में उस के तू ने क्यूँ ख़त्त-ओ-ख़ाल बाँधे

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koi to fool khilaye dua ke liye

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में
अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में

ये वक़्त किस की रऊनत पे ख़ाक डाल गया
ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में

न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है
हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में

खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है
अजब कमाल है उस बेवफ़ा के लहजे में

यही है मस्लहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर
हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में

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dard-emohabbat aam nhi hai

बयान-ए-दर्द-ए-मोहब्बत जो बार बार न हो
कोई नक़ाब तिरे रुख़ की पर्दा-दार न हो

सलाम-ए-शौक़ की जुरअत से दिल लरज़ता है
कहीं मिज़ाज गिरामी पे ये भी बार न हो

करम पे आएँ तो हर हर अदा में इश्क़ ही इश्क़
न हो तो उन का तग़ाफ़ुल भी आश्कार न हो

यही ख़याल रहा पत्थरों की बारिश में
कहीं उन्हीं में कोई संग-ए-कू-ए-यार न हो

अभी है आस कि आख़िर कभी तो आएगा
वो एक लम्हा कि जब तेरा इंतिज़ार न हो

बहुत फ़रेब समझता हूँ फिर भी ऐ ‘आली’
मैं क्या करूँ अगर उन पर भी ए’तिबार न हो

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najar se dil ka gubar utra

चमन मैं रंग-ए-बहार उतरा तो मैं ने देखा
नज़र से दिल का ग़ुबार उतरा तो मैं ने देखा

मैं नीम-शब आसमाँ की वुसअ’त को देखता था
ज़मीं पे वो हुस्न-ज़ार उतरा तो मैं ने देखा

गली के बाहर तमाम मंज़र बदल गए थे
जो साया-ए-कू-ए-यार उतरा तो मैं ने देखा

ख़ुमार-ए-मय में वो चेहरा कुछ और लग रहा था
दम-ए-सहर जब ख़ुमार उतरा तो मैं ने देखा

इक और दरिया का सामना था ‘मुनीर’ मुझ को
मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा

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be khayali me ek irada kar liya

बे-ख़याली में यूँही बस इक इरादा कर लिया
अपने दिल के शौक़ को हद से ज़ियादा कर लिया

जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं
उस ने वा’दा कर लिया मैं ने भी वा’दा कर लिया

ग़ैर से नफ़रत जो पा ली ख़र्च ख़ुद पर हो गई
जितने हम थे हम ने ख़ुद को उस से आधा कर लिया

शाम के रंगों में रख कर साफ़ पानी का गिलास
आब-ए-सादा को हरीफ़-ए-रंग-ए-बादा कर लिया

हिजरतों का ख़ौफ़ था या पुर-कशिश कोहना मक़ाम
क्या था जिस को हम ने ख़ुद दीवार-ए-जादा कर लिया

एक ऐसा शख़्स बनता जा रहा हूँ मैं ‘मुनीर’
जिस ने ख़ुद पर बंद हुस्न ओ जाम ओ बादा कर लिया

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khuda jane jalwa-e-jana kaha tak hai

क़फ़स की तीलियों से ले के शाख़-ए-आशियाँ तक है
मिरी दुनिया यहाँ से है मिरी दुनिया वहाँ तक है

ज़मीं से आसमाँ तक आसमाँ से ला-मकाँ तक है
ख़ुदा जाने हमारे इश्क़ की दुनिया कहाँ तक है

ख़ुदा जाने कहाँ से जल्वा-ए-जानाँ कहाँ तक है
वहीं तक देख सकता है नज़र जिस की जहाँ तक है

कोई मर कर तो देखे इम्तिहाँ-गाह-ए-मोहब्बत में
कि ज़ेर-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल हयात-ए-जावेदाँ तक है

नियाज़-ओ-नाज़ की रूदाद-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का क़िस्सा
ये जो कुछ भी है सब उन की हमारी दास्ताँ तक है

क़फ़स में भी वही ख़्वाब-ए-परेशाँ देखता हूँ मैं
कि जैसे बिजलियों की रौ फ़लक से आशियाँ तक है

ख़याल-ए-यार ने तो आते ही गुम कर दिया मुझ को
यही है इब्तिदा तो इंतिहा उस की कहाँ तक है

जवानी और फिर उन की जवानी ऐ मआज़-अल्लाह
मिरा दिल क्या तह-ओ-बाला निज़ाम-ए-दो-जहाँ तक है

हम इतना भी न समझे अक़्ल खोई दिल गँवा बैठे
कि हुस्न-ओ-इश्क़ की दुनिया कहाँ से है कहाँ तक है

वो सर और ग़ैर के दर पर झुके तौबा मआज़-अल्लाह
कि जिस सर की रसाई तेरे संग-ए-आस्ताँ तक है

ये किस की लाश बे-गोर-ओ-कफ़न पामाल होती है
ज़मीं जुम्बिश में है बरहम निज़ाम-ए-आसमाँ तक है

जिधर देखो उधर बिखरे हैं तिनके आशियाने के
मिरी बर्बादियों का सिलसिला या-रब कहाँ तक है

न मेरी सख़्त-जानी फिर न उन की तेग़ का दम-ख़म
मैं उस के इम्तिहाँ तक हूँ वो मेरे इम्तिहाँ तक है

ज़मीं से आसमाँ तक एक सन्नाटे का आलम है
नहीं मालूम मेरे दिल की वीरानी कहाँ तक है

सितमगर तुझ से उम्मीद-ए-करम होगी जिन्हें होगी
हमें तो देखना ये था कि तू ज़ालिम कहाँ तक है

नहीं अहल-ए-ज़मीं पर मुनहसिर मातम शहीदों का
क़बा-ए-नील-गूँ पहने फ़ज़ा-ए-आसमाँ तक है

सुना है सूफ़ियों से हम ने अक्सर ख़ानक़ाहों में
कि ये रंगीं-बयानी ‘बेदम’-ए-रंगीं-बयाँ तक है

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