Meri ulfat mujhe kaafir banaa de

Meri ulfat mujhe kaafir banaa de
Siva tere koi dil me mere agar ho
Mujhe aaka ataa aisi nazer ho
Main dekhu jis traf tu jalwager ho

Mujhe kya kaam hai dair o haram se
Mera sajda udher hai tu jidher ho
Mujhe sara jahan apna kahe ga
Meri jaanib teri nazer ho

Sarapa bandagi bo zindagi hai
Khayal e mustfa(s.a.w) me jo basher ho
Nahi iske siva koi tamnna
Jab aaye mout tu pese nazer ho

Yehi bas aarzu hai yaa ilahi
Jamal e yaar ho meri nazer ho

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Ye Shaki Ki karamat hai ya faize mai parasti hai

ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है
घटा के भेस में मय-ख़ाने पर रहमत बरसती है

ये जो कुछ देखते हैं हम फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती है
तख़य्युल के करिश्मे हैं बुलंदी है न पस्ती है

वहाँ हैं हम जहाँ ‘बेदम’ न वीराना न बस्ती है
न पाबंदी न आज़ादी न हुश्यारी न मस्ती है

तिरी नज़रों पे चढ़ना और तिरे दिल से उतर जाना
मोहब्बत में बुलंदी जिस को कहते हैं वो पस्ती है

वही हम थे कभी जो रात दिन फूलों में तुलते थे
वही हम हैं कि तुर्बत चार फूलों को तरसती है

करिश्मे हैं कि नक़्काश-ए-अज़ल नैरंगियाँ तेरी
जहाँ में माइल-ए-रंग-ए-फ़ना हर नक़्श-ए-हस्ती है

इसे भी नावक-ए-जानाँ तू अपने साथ लेता जा
कि मेरी आरज़ू दिल से निकलने को तरसती है

हर इक ज़र्रे में है इन्नी-अनल्लाह की सदा साक़ी
अजब मय-कश थे जिन की ख़ाक में भी जोश-ए-मस्ती है

ख़ुदा रक्खे दिल-ए-पुर-सोज़ तेरी शोला-अफ़्शानी
कि तू वो शम्अ है जो रौनक़-ए-दरबार-ए-हस्ती है

मिरे दिल के सिवा तू ने भी देखी बेकसी मेरी
कि आबादी न हो जिस में कोई ऐसी भी बस्ती है

हिजाबात-ए-तअय्युन माने-ए-दीदार समझा था
जो देखा तो नक़ाब-ए-रू-ए-जानाँ मेरी हस्ती है

अजब दुनिया-ए-हैरत आलम-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ है
कि वीराने का वीराना है और बस्ती की बस्ती है

कहीं है अब्द की धुन और कहीं शोर-ए-अनल-हक़ है
कहीं इख़्फ़ा-ए-मस्ती है कहीं इज़हार-ए-मस्ती है

बनाया रश्क-ए-महर-ओ-मह तिरी ज़र्रा-नवाज़ी ने
नहीं तो क्या है ‘बेदम’ और क्या ‘बेदम’ की हस्ती है

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Aa hī jaatā vo raah par

Aa hī jaatā vo raah par ‘ġhālib’
koī din aur bhī jiye hote

aae hai bekasī-e-ishq pe ronā ‘ġhālib’
kis ke ghar jā.egā sailāb-e-balā mere baad

āīna dekh apnā sā muñh le ke rah ga.e
sāhab ko dil na dene pe kitnā ġhurūr thā

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Aa ki Mirī jaan ko Qarār Nahīñ hai

Aa ki mirī jaan ko qarār nahīñ hai

tāqat-e-bedād-e-intizār nahīñ hai

dete haiñ jannat hayāt-e-dahr ke badle

nashsha ba-andāza-e-ḳhumār nahīñ hai

girya nikāle hai terī bazm se mujh ko

haa.e ki rone pe iḳhtiyār nahīñ hai

ham se abas hai gumān-e-ranjish-e-ḳhātir

ḳhaak meñ ushshāq kī ġhubār nahīñ hai

dil se uThā lutf-e-jalva-hā-e-ma.ānī

ġhair-e-gul ā.īna-e-bahār nahīñ hai

qatl kā mere kiyā hai ahd to baare

vaa.e agar ahd ustuvār nahīñ hai

tū ne qasam mai-kashī kī khaa.ī hai ‘ġhālib’

terī qasam kā kuchh e’tibār nahīñ hai

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Aina kyu Na do

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में

गुल-दस्ता-ए-निगाह सुवैदा कहें जिसे

फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा

अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना कहें जिसे

सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिए

वो एक मुश्त-ए-ख़ाक कि सहरा कहें जिसे

है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहाँ

शौक़-ए-इनाँ गुसेख़्ता दरिया कहें जिसे

दरकार है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-ऐश को

सुब्ह-ए-बहार पुम्बा-ए-मीना कहें जिसे

‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे

ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

या रब हमें तो ख़्वाब में भी मत दिखाइयो

ये महशर-ए-ख़याल कि दुनिया कहें जिसे

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Mere aagosh-e-taswwur se nikalna hai muhaal

Mere aagosh-e-taswwur se nikalna hai muhaal
Ab khyal-e-yaar ko sanche me dhal kr rahe gaya

Aatish e rasko hasad se sang bhi khali nahi..
Deed moosa ko hui or toor jal kr rahe gaya…

Ek hamara dil ke maheve lazzate didaar e shamma..
Ek parvana jo dekha or jal kr rahe gaya

Raaz dil ka parda rkhkha raaz e husne yaar ne..
Harf e matlab muh se nikalna or nikal kr rahe gaya

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Hum mai-kade se mar ke bhi bahar na jaenge

हम मय-कदे से मर के भी बाहर न जाएँगे
मय-कश हमारी ख़ाक के साग़र बनाएँगे

वो इक कहेंगे हम से तो हम सौ सुनाएँगे
मुँह आएँगे हमारे तो अब मुँह की खाएँगे

कुछ चारासाज़ी नालों ने की हिज्र में मिरी
कुछ अश्क मेरे दिल की लगी को बुझाएँगे

वो मिस्ल-ए-अश्क उठ नहीं सकता ज़मीन से
जिस को हुज़ूर अपनी नज़र से गिराएँगे

झोंके नसीम-ए-सुब्ह के आ आ के हिज्र में
इक दिन चराग़-ए-हस्ती-ए-आशिक़ बुझाएँगे

सहरा की गर्द होगी कफ़न मुझ ग़रीब का
उठ कर बगूले मेरा जनाज़ा उठाएँगे

अब ठान ली है दिल में कि सर जाए या रहे
जैसे उठेगा बार-ए-मोहब्बत उठाएँगे

गर्दिश ने मेरी चर्ख़ का चकरा दिया दिमाग़
नालों से अब ज़मीं के तबक़ थरथराएँंगे

‘बेदम’ वो ख़ुश नहीं हैं तो अच्छा यूँही सही
ना-ख़ुश ही हो के ग़ैर मिरा क्या बनाएँगे

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Parde uThe hue bhi hain unki idhar nazar bhi hai

पर्दे उठे हुए भी हैं उन की इधर नज़र भी है
बढ़ के मुक़द्दर आज़मा सर भी है संग-ए-दर भी है

जल गई शाख़-ए-आशियाँ मिट गया तेरा गुल्सिताँ
बुलबुल-ए-ख़ानुमाँ-ख़राब अब कहीं तेरा घर भी है

अब न वो शाम शाम है अपनी न वो सहर सहर
होने को यूँ तो रोज़ ही शाम भी है सहर भी है

चाहे जिसे बनाइए अपना निशाना-ए-नज़र
ज़द पे तुम्हारे तीर के दिल भी है और जिगर भी है

दिन को उसी से रौशनी शब को उसी से चाँदनी
सच तो ये है कि रू-ए-यार शम्स भी है क़मर भी है

ज़ुल्फ़-ब-दोश बे-नक़ाब घर से निकल खड़े हुए
अब तो समझ गए हुज़ूर नालों में कुछ असर भी है

‘बेदम’-ए-ख़स्ता का मज़ार आप तो चल के देखिए
शम्अ बना है दाग़-ए-दिल बेकसी नौहागर भी है

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Apni hasti ka agar husn numayan ho jae

अपनी हस्ती का अगर हुस्न नुमायाँ हो जाए
आदमी कसरत-ए-अनवार से हैराँ हो जाए

तुम जो चाहो तो मिरे दर्द का दरमाँ हो जाए
वर्ना मुश्किल है कि मुश्किल मिरी आसाँ हो जाए

ओ नमक-पाश तुझे अपनी मलाहत की क़सम
बात तो जब है कि हर ज़ख़्म नमकदाँ हो जाए

देने वाले तुझे देना है तो इतना दे दे
कि मुझे शिकवा-ए-कोताही-ए-दामाँ हो जाए

उस सियह-बख़्त की रातें भी कोई रातें हैं
ख़्वाब-ए-राहत भी जिसे ख़्वाब-ए-परेशाँ हो जाए

सीना-ए-शिबली-ओ-मंसूर तो फूँका तू ने
इस तरफ़ भी करम ऐ जुम्बिश-ए-दामाँ हो जाए

आख़िरी साँस बने ज़मज़मा-ए-हू अपना
साज़-ए-मिज़राब-ए-फ़ना तार-ए-रग-ए-जाँ हो जाए

तू जो असरार-ए-हक़ीक़त कहीं ज़ाहिर कर दे
अभी ‘बेदम’ रसन-ओ-दार का सामाँ हो जाए

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