ghar jab bana liya

घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर
जानेगा अब भी तू न मिरा घर कहे बग़ैर

कहते हैं जब रही न मुझे ताक़त-ए-सुख़न
जानूँ किसी के दिल की मैं क्यूँकर कहे बग़ैर

काम उस से आ पड़ा है कि जिस का जहान में
लेवे न कोई नाम सितमगर कहे बग़ैर

जी में ही कुछ नहीं है हमारे वगरना हम
सर जाए या रहे न रहें पर कहे बग़ैर

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना
छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़र कहे बग़ैर

मक़्सद है नाज़-ओ-ग़म्ज़ा वले गुफ़्तुगू में काम
चलता नहीं है दशना-ओ-ख़ंजर कहे बग़ैर

हर चंद हो मुशाहिदा-ए-हक़ की गुफ़्तुगू
बनती नहीं है बादा-ओ-साग़र कहे बग़ैर

बहरा हूँ मैं तो चाहिए दूना हो इल्तिफ़ात
सुनता नहीं हूँ बात मुकर्रर कहे बग़ैर

‘ग़ालिब’ न कर हुज़ूर में तू बार बार अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर

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dariya me fana ho jana

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

तुझ से क़िस्मत में मिरी सूरत-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना

दिल हुआ कशमकश-ए-चारा-ए-ज़हमत में तमाम
मिट गया घिसने में इस उक़दे का वा हो जाना

अब जफ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह
इस क़दर दुश्मन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना

ज़ोफ़ से गिर्या मुबद्दल ब-दम-ए-सर्द हुआ
बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना

दिल से मिटना तिरी अंगुश्त-ए-हिनाई का ख़याल
हो गया गोश्त से नाख़ुन का जुदा हो जाना

है मुझे अब्र-ए-बहारी का बरस कर खुलना
रोते रोते ग़म-ए-फ़ुर्क़त में फ़ना हो जाना

गर नहीं निकहत-ए-गुल को तिरे कूचे की हवस
क्यूँ है गर्द-ए-रह-ए-जौलान-ए-सबा हो जाना

बख़्शे है जल्वा-ए-गुल ज़ौक़-ए-तमाशा ‘ग़ालिब’
चश्म को चाहिए हर रंग में वा हो जाना

ता कि तुझ पर खुले एजाज़-ए-हवा-ए-सैक़ल
देख बरसात में सब्ज़ आइने का हो जाना

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bhaut raha hai kabhi

बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
गुज़र चुकी है ये फ़स्ल-ए-बहार हम पर भी

उरूस-ए-दहर को आया था प्यार हम पर भी
ये बेसवा थी किसी शब निसार हम पर भी

बिठा चुका है ज़माना हमें भी मसनद पर
हुआ किए हैं जवाहिर निसार हम पर भी

अदू को भी जो बनाया है तुम ने महरम-ए-राज़
तो फ़ख़्र क्या जो हुआ ए’तिबार हम पर भी

ख़ता किसी की हो लेकिन खुली जो उन की ज़बाँ
तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी

हम ऐसे रिंद मगर ये ज़माना है वो ग़ज़ब
कि डाल ही दिया दुनिया का बार हम पर भी

हमें भी आतिश-ए-उल्फ़त जला चुकी ‘अकबर’
हराम हो गई दोज़ख़ की नार हम पर भी

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haya se sar jhuk gya

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है
मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना

बलाएँ लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं
ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देना

ख़ुदा की याद में महवियत-ए-दिल बादशाही है
मगर आसाँ नहीं है सारी दुनिया को भुला देना

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dard to maujood hai

दर्द तो मौजूद है दिल में दवा हो या न हो
बंदगी हालत से ज़ाहिर है ख़ुदा हो या न हो

झूमती है शाख़-ए-गुल खिलते हैं ग़ुंचे दम-ब-दम
बा-असर गुलशन में तहरीक-ए-सबा हो या न हो

वज्द में लाते हैं मुझ को बुलबुलों के ज़मज़मे
आप के नज़दीक बा-मअ’नी सदा हो या न हो

कर दिया है ज़िंदगी ने बज़्म-ए-हस्ती में शरीक
उस का कुछ मक़्सूद कोई मुद्दआ हो या न हो

क्यूँ सिवल-सर्जन का आना रोकता है हम-नशीं
इस में है इक बात ऑनर की शिफ़ा हो या न हो

मौलवी साहिब न छोड़ेंगे ख़ुदा गो बख़्श दे
घेर ही लेंगे पुलिस वाले सज़ा हो या न हो

मिमबरी से आप पर तो वार्निश हो जाएगी
क़ौम की हालत में कुछ इस से जिला हो या न हो

मो’तरिज़ क्यूँ हो अगर समझे तुम्हें सय्याद दिल
ऐसे गेसू हूँ तो शुबह दाम का हो या न हो

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ye dost mai mit gya ho

ऐ दोस्त मिट गया हूँ फ़ना हो गया हूँ मैं
इस दौर-ए-दोस्ती की दवा हो गया हूँ मैं

क़ाएम किया है मैं ने अदम के वजूद को
दुनिया समझ रही है फ़ना हो गया हूँ मैं

हिम्मत बुलंद थी मगर उफ़्ताद देखना
चुप-चाप आज महव-ए-दुआ हो गया हूँ मैं

ये ज़िंदगी फ़रेब-ए-मुसलसल न हो कहीं
शायद असीर-ए-दाम-ए-बला हो गया हूँ मैं

हाँ कैफ़-ए-बे-ख़ुदी की वो साअत भी याद है
महसूस कर रहा था ख़ुदा हो गया हूँ मैं

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ek bar fir batan aa gya

इक बार फिर वतन में गया जा के आ गया
लख़्त-ए-जिगर को ख़ाक में दफ़ना के आ गया

हर हम-सफ़र पे ख़िज़्र का धोका हुआ मुझे
आब-ए-बक़ा की राह से कतरा के आ गया

हूर-ए-लहद ने छीन लिया तुझ को और मैं
अपना सा मुँह लिए हुए शर्मा के आ गया

दिल ले गया मुझे तिरी तुर्बत पे बार बार
आवाज़ दे के बैठ के उकता के आ गया

रोया कि था जहेज़ तिरा वाजिब-उल-अदा
मेंह मोतियों का क़ब्र पे बरसा के आ गया

मेरी बिसात क्या थी हुज़ूर-ए-रज़ा-ए-दोस्त
तिनका सा एक सामने दरिया के आ गया

अब के भी रास आई न हुब्ब-ए-वतन ‘हफ़ीज़’
अब के भी एक तीर-ए-क़ज़ा खा के आ गया

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jindagi ka lutf

ज़िंदगी का लुत्फ़ भी आ जाएगा
ज़िंदगानी है तो देखा जाएगा

जिस तरह लकड़ी को खा जाता है घुन
रफ़्ता रफ़्ता ग़म मुझे खा जाएगा

हश्र के दिन मेरी चुप का माजरा
कुछ न कुछ तुम से भी पूछा जाएगा

मुस्कुरा कर मुँह चिड़ा कर घूर कर
जा रहे हो ख़ैर देखा जाएगा

कर दिया है तुम ने दिल को मुतमइन
देख लेना सख़्त घबरा जाएगा

हज़रत-ए-दिल काम से जाऊँगा मैं
दिल-लगी में आप का क्या जाएगा

दोस्तों की बेवफ़ाई पर ‘हफ़ीज़’
सब्र करना भी मुझे आ जाएगा

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ishq me tere koh-e-gum

इश्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया जो हो सो हो
ऐश-ओ-निशात-ए-ज़िंदगी छोड़ दिया जो हो सो हो

अक़्ल के मदरसे से हो इश्क़ के मय-कदा में आ
जाम-ए-फ़ना व बे-ख़ुदी अब तो पिया जो हो सो हो

लाग की आग लग उठी पम्बा तरह सा जल गया
रख़्त-ओ-जूद जान-आे-तन कुछ न बचा जो हो सो हो

हिज्र की सब मुसीबतें अर्ज़ कीं उस के रू-ब-रू
नाज़-ओ-अदा से मुस्कुरा कहने लगा जो हो सो हो

दुनिया के नेक-ओ-बद से काम हम को ‘नियाज़’ कुछ नहीं
आप से जो गुज़र गया फिर उसे क्या जो हो सो हो

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humko aina banaya yar ne

हम को याँ दर दर फिराया यार ने
ला-मकाँ में घर बनाया यार ने

आप अपने देखने के वास्ते
हम को आईना बनाया यार ने

अपने इक अदना तमाशे के लिए
हम को सूली पर चढ़ाया यार ने

आप छुप के हम को कर के रू-ब-रू
ख़ूब ही रुस्वा कराया यार ने

आप तो बुत बन के की जल्वागरी
और हमें काफ़िर बनाया यार ने

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