Bura hi kya tha jo Aap

बुरा ही क्या था जो आप अपनी मिसाल होते कमाल होते
किसी तरह से जो टूटे रिश्ते बहाल होते कमाल होते

ये लैला मजनूँ ये हीर राँझा ये शीरीं फ़रहाद की मोहब्बत
थी ऐसी शिद्दत कहीं जो उन के विसाल होते कमाल होते

पढ़ा नहीं था निसाब-ए-उल्फ़त अमल में आगे थे हर किसी से
समझती दुनिया अगर हमें बे-मिसाल होते कमाल होते

वो मुझ से मिलता ख़मोश रहता ख़मोशियों पर ही दाद पाता
मगर जो नज़रों से मुनफ़रिद से सवाल होते कमाल होते

ये क्या कि तन्हाइयों से रिश्ता बना के ख़ुद को गँवा लिया है
समा के मुझ में जो आप मेरा जमाल होते कमाल होते

जिसे भी देखा उसी को दावा-ए-हुस्न करते सुना गया है
जहान भर में हसीं अगर ख़ाल-ख़ाल होते कमाल होते

नसीब अपना सुख़नवरों में हमारी गिनती न हो सकेगी
‘उमर’ अदाकार हम अगर बा-कमाल होते कमाल होते

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sab ko dil ke daag dikhaye nhi

सब को दिल के दाग़ दिखाए एक तुझी को दिखा न सके
तेरा दामन दूर नहीं था हाथ हमीं फैला न सके

तू ऐ दोस्त कहाँ ले आया चेहरा ये ख़ुर्शीद-मिसाल
सीने में आबाद करेंगे आँखों में तो समा न सके

ना तुझ से कुछ हम को निस्बत ना तुझ को कुछ हम से काम
हम को ये मालूम था लेकिन दिल को ये समझा न सके

अब तुझ से किस मुँह से कह दें सात समुंदर पार न जा
बीच की इक दीवार भी हम तो फाँद न पाए ढा न सके

मन पापी की उजड़ी खेती सूखी की सूखी ही रही
उमडे बादल गरजे बादल बूँदें दो बरसा न सके

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Hai Dil ko is Tarah se mire yaar ki talash

है दिल को इस तरह से मिरे यार की तलाश
जिस तरह थी कलीम को दीदार की तलाश

हों रिंद सर खुला भी जो होवे तो डर नहीं
ज़ाहिद नहीं कि मुझ को हो दस्तार की तलाश

मैं हूँ कहीं प आठों पहर है उसी की फ़िक्र
जाती नहीं है दिल से मिरे यार की तलाश

दिल हाथों-हाथ बिक गया बाज़ार-ए-इश्क़ में
करनी पड़ी न मुझ को ख़रीदार की तलाश

अपने ही दिल में ढूँढना लाज़िम था यार को
इतने दिनों जो की भी तो बे-कार की तलाश

बैआना नक़्द-ए-जाँ करो ‘सय्याह’ पेश-कश
रहती है उन को ऐसे ख़रीदार की तलाश

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lipat lipat ke main us gul ke sath

लिपट लिपट के मैं उस गुल के साथ सोता था
रक़ीब सुब्ह को मुँह आँसुओं से धोता था

तमाम रात थी और कुहनीयाँ ओ लातें थीं
न सोने देता था मुझ को न आप सोता था

जो बात हिज्र की आती तो अपने दामन से
वो आँसू पोंछता जाता था और मैं रोता था

मसक्ती चोली तो लोगों से छुप के सीने को
वो तागे बटता था और मैं सूई पिरोता था

ग़रज़ दिखाने को आन ओ अदा के सौ आलम
वो मुझ से पाँव धुलाता था और मैं धोता था

लिटा के सीने पे चंचल को प्यार से हर-दम
मैं गुदगुदाता था हँस हँस वो ज़ोफ़ खोता था

वो मुझ पे फेंकता पानी की कुल्लियाँ भर भर
मैं उस के छींटों से तो पैरहन भिगोता था

नहाने जाते तो फिर आह करती छींटों से
वो ग़ोते देता था और मैं उसे डुबोता था

हुआ न मुझ को ख़ुमार आख़िर उन शराबों का
‘नज़ीर’ आह इसी रोज़ को मैं रोता था

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uske chehre ki chamak ke samne

उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा
आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा

जिस घड़ी आया पलट कर इक मिरा बिछड़ा हुआ
आम से कपड़ों में था वो फिर भी शहज़ादा लगा

हर घड़ी तय्यार है दिल जान देने के लिए
उस ने पूछा भी नहीं ये फिर भी आमादा लगा

कारवाँ है या सराब-ए-ज़िंदगी है क्या है ये
एक मंज़िल का निशाँ इक और ही जादा लगा

रौशनी ऐसी अजब थी रंग-भूमी की ‘नसीम’
हो गए किरदार मुदग़म कृष्ण भी राधा लगा

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thokre kha ke sabhalna nhi ata

ठोकरें खा के सँभलना नहीं आता है मुझे
चल मिरे साथ कि चलना नहीं आता है मुझे

अपनी आँखों से बहा दे कोई मेरे आँसू
अपनी आँखों से निकलना नहीं आता है मुझे

अब तिरी गर्मी-ए-आग़ोश ही तदबीर करे
मोम हो कर भी पिघलना नहीं आता है मुझे

शाम कर देता है अक्सर कोई ज़ुल्फ़ों वाला
वर्ना वो दिन हूँ कि ढलना नहीं आता है मुझे

कितने दिल तोड़ चुका हूँ इसी बे-हुनरी से
जाल में फँस के निकलना नहीं आता है मुझे

बीच दरिया के मैं दरिया तो बदल सकता हूँ
अपनी कश्ती को बदलना नहीं आता है मुझे

अपने मा’नी को बदलना तो मुझे आता है
इन के लफ़्ज़ों को बदलना नहीं आता है मुझे

‘फ़रहत-एहसास’ तरक़्क़ी नहीं करनी मुझ को
इतनी रफ़्तार से चलना नहीं आता है मुझे

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tumhe us se mohabbat hai

तुम्हें उस से मोहब्बत है तो हिम्मत क्यूँ नहीं करते
किसी दिन उस के दर पे रक़्स-ए-वहशत क्यूँ नहीं करते

इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से
मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते

तुम्हारे दिल पे अपना नाम लिक्खा हम ने देखा है
हमारी चीज़ फिर हम को इनायत क्यूँ नहीं करते

मिरी दिल की तबाही की शिकायत पर कहा उस ने
तुम अपने घर की चीज़ों की हिफ़ाज़त क्यूँ नहीं करते

बदन बैठा है कब से कासा-ए-उम्मीद की सूरत
सो दे कर वस्ल की ख़ैरात रुख़्सत क्यूँ नहीं करते

क़यामत देखने के शौक़ में हम मर मिटे तुम पर
क़यामत करने वालो अब क़यामत क्यूँ नहीं करते

मैं अपने साथ जज़्बों की जमाअत ले के आया हूँ
जब इतने मुक़तदी हैं तो इमामत क्यूँ नहीं करते

तुम अपने होंठ आईने में देखो और फिर सोचो
कि हम सिर्फ़ एक बोसे पर क़नाअ’त क्यूँ नहीं करते

बहुत नाराज़ है वो और उसे हम से शिकायत है
कि इस नाराज़गी की भी शिकायत क्यूँ नहीं करते

कभी अल्लाह-मियाँ पूछेंगे तब उन को बताएँगे
किसी को क्यूँ बताएँ हम इबादत क्यूँ नहीं करते

मुरत्तब कर लिया है कुल्लियात-ए-ज़ख़्म अगर अपना
तो फिर ‘एहसास-जी’ इस की इशाअ’त क्यूँ नहीं करते

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aakho se mohabbat ke eshare nikal aaye

आँखों से मोहब्बत के इशारे निकल आए
बरसात के मौसम में सितारे निकल आए

था तुझ से बिछड़ जाने का एहसास मगर अब
जीने के लिए और सहारे निकल आए

मैं ने तो यूँही ज़िक्र-ए-वफ़ा छेड़ दिया था
बे-साख़्ता क्यूँ अश्क तुम्हारे निकल आए

जब मैं ने सफ़ीने में तिरा नाम लिया है
तूफ़ान की बाहोँ से किनारे निकल आए

हम जाँ तो बचा लाते मगर अपना मुक़द्दर
इस भीड़ में कुछ दोस्त हमारे निकल आए

जुगनू इन्हें समझा था मगर क्या कहूँ ‘मंसूर’
मुट्ठी को जो खोला तो शरारे निकल आए

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Awargi ne dil ki ajab kaam kar diya

आवारगी ने दिल की अजब काम कर दिया
ख़्वाबों को बोझ नींदों को इल्ज़ाम कर दिया

कुछ आँसू अपने प्यार की पहचान बन गए
कुछ आँसुओं ने प्यार को बद-नाम कर दिया

जिस को बचाए रखने में अज्दाद बिक गए
हम ने उसी हवेली को नीलाम कर दिया

दिल को बचा के रक्खा था दुनिया से आज तक
ले आज हम ने ये भी तिरे नाम कर दिया

तुम ने नज़र झुका के जहाँ बात काट दी
हम ने वहीं फ़साने का अंजाम कर दिया

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Agar yu hi ye dil satata rahega

अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा
तो इक दिन मिरा जी ही जाता रहेगा

मैं जाता हूँ दिल को तिरे पास छोड़े
मिरी याद तुझ को दिलाता रहेगा

गली से तिरी दिल को ले तो चला हूँ
मैं पहुँचूँगा जब तक ये आता रहेगा

जफ़ा से ग़रज़ इम्तिहान-ए-वफ़ा है
तू कह कब तलक आज़माता रहेगा

क़फ़स में कोई तुम से ऐ हम-सफ़ीरो
ख़बर गुल की हम को सुनाता रहेगा

ख़फ़ा हो के ऐ ‘दर्द’ मर तो चला तू
कहाँ तक ग़म अपना छुपाता रहेगा

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