Ek pal me kya kuch badal gya

इक पल में क्या कुछ बदल गया जब बे-ख़बरों को ख़बर हुई
मैं तंहाई में छुपा रहा जब मुझ पर उस की नज़र हुई

इक चाँद चमक कर चला गया फिर कितनी घड़ियाँ गुज़र गईं
मुझ को तो कुछ भी ख़बर न थी कब रात हुई कब सहर हुई

थी हुस्न की छब इक अजब अदा जब फूल सा चेहरा महक उठा
वो मंज़र मुझ को जचा बहुत फिर उम्र उसी में बसर हुई

आना भी तेरा ग़ज़ब हुआ इस शहर का मंज़र बदल गया
भौंचाल सा आया गली गली हर चीज़ इधर से उधर हुई

ये रोग लगा है अजब हमें जो जान भी ले कर टला नहीं
हर एक दवा बे-असर गई हर एक दुआ बे-असर हुई

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baat baat ban gai hai

दर्द की शाख़ पे इक ताज़ा समर आ गया है
किस की आमद है ‘ज़िया’ कौन नज़र आ गया है

जाने किस जुर्म की पाई है सज़ा पैरों ने
इक सफ़र ख़त्म पे है अगला सफ़र आ गया है

लहर ख़ुद पर है पशेमान कि उस की ज़द में
नन्हे हाथों से बना रेत का घर आ गया है

दर्द भी सहना तबस्सुम भी लबों पर रखना
मर्हबा इश्क़ हमें भी ये हुनर आ गया है

आ गया उस की बुज़ुर्गी का ख़याल आँधी को
वे जो इक राह में बोसीदा शजर आ गया है

उस की आँखों में नहीं पहली सी चाहत लेकिन
ये भी क्या कम है कि वे लौट के घर आ गया है

अपनी महरूमी पे होने ही लगा था मायूस
देखता क्या हूँ दुआओं में असर आ गया है

ज़िंदगी रोक के अक्सर यही कहती है मुझे
तुझ को जाना था किधर और किधर आ गया है

हक़ परस्तों के लिए सब्र का लम्हा है ‘ज़िया’
झूट के नेज़े पे सच्चाई का सर आ गया है

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na main samjha na aap aaye

न मैं समझा न आप आए कहीं से
पसीना पोछिए अपनी जबीं से

चली आती है होंटों पर शिकायत
नदामत टपकी पड़ती है जबीं से

अगर सच है हसीनों में तलव्वुन
तो है उम्मीद-ए-वस्ल उन की नहीं से

कहाँ की दिल-लगी कैसी मोहब्बत
मुझे इक लाग है जान-ए-हज़ीं से

इधर लाओ ज़रा दस्त-ए-हिनाई
पकड़ दें चोर दिल का हम यहीं से

जुनूँ में इस ग़ज़ब की ख़ाक उड़ाई
बनाया आसमाँ हम ने ज़मीं से

वहाँ आशिक़-कुशी है ऐन-ईमाँ
उन्हें क्या बहस ‘अनवर’ कुफ़्र-ओ-दीं से

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khaaq ho jayege hum tumko khabar hone tak

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की ता’लीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होते तक

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होते तक

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक

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Aane lage h ab bo mere pass

ऐ दोस्त दर्द-ए-दिल का मुदावा किया न जाए
व’अदा अगर किया है तो ईफ़ा किया न जाए

आने लगे हैं वो भी अयादत के वास्ते
ऐ चारागर मरीज़ को अच्छा किया न जाए

मजबूरियों के राज़ न खुल जाएँ ब’अद-ए-मर्ग
क़ातिल हमारे क़त्ल का चर्चा किया न जाए

आएगी अपने लब पे तो होगी पराई बात
लाज़िम है राज़-ए-दिल कभी इफ़शा किया न जाए

वो ख़ुद ही जान लेंगे मिरे दिल का मुद्दआ
बेहतर यही है अर्ज़-ए-तमन्ना किया न जाए

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yaad rah jayegi ye raat kareeb aa jao

दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ
याद रह जाएगी ये रात क़रीब आ जाओ

एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की
आज बस में नहीं जज़्बात क़रीब आ जाओ

सर्द झोंकों से भड़कते हैं बदन में शो’ले
जान ले लेगी ये बरसात क़रीब आ जाओ

इस क़दर हम से झिजकने की ज़रूरत क्या है
ज़िंदगी भर का है अब साथ क़रीब आ जाओ

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Tere Didar Ka irada kru main

तू हज़ार बार भी रूठे तो मना लूँगा तुझे
मगर देख मोहब्बत में शामिल कोई दूसरा ना हो

किस्मत यह मेरा इम्तेहान ले रही है
तड़पकर यह मुझे दर्द दे रही है
दिल से कभी भी मैंने उसे दूर नहीं किया
फिर क्यों बेवफाई का वह इलज़ाम दे रही है

वापस लौट आया है हवाओं का रुख मोड़ने वाला
दिल में फिर उतर रहा है दिल तोड़ने वाला

जो शख्स तेरे तसव्वुर से हे महक जाये
सोचो तुम्हारे दीदार में उसका क्या होगा

सांसों की डोर छूटती जा रही है
किस्मत भी हमे दर्द देती जा रही है
मौत की तरफ हैं कदम हमारे
मोहब्बत भी हम से छूटती जा रही है

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wo saksh jo aznabi tha

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया

ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आइने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ समा गया

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
अलम-कशो उठो कि आफ़्ताब सर पे आ गया

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dekha jo uss taraf to badan par najar gai

देखा जो उस तरफ़ तो बदन पर नज़र गई
इक आग थी जो मेरे पियाले में भर गई

उन रास्तों में नाम-ओ-नसब का निशाँ न था
हंगामा-ए-बहार में ख़िल्क़त जिधर गई

इक दास्तान अब भी सुनाते हैं फ़र्श ओ बाम
वो कौन थी जो रक़्स के आलम में मर गई

इतना क़रीब पा के उसे दम-ब-ख़ुद था मैं
ऐसा लगा ज़मीन की गर्दिश ठहर गई

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nayi duniya dilksh maloom hoti hai

नई दुनिया मुजस्सम दिलकशी मालूम होती है
मगर इस हुस्न में दिल की कमी मालूम होती है

हिजाबों में नसीम-ए-ज़िंदगी मालूम होती है
किसी दामन की हल्की थरथरी मालूम होती है

मिरी रातों की ख़ुनकी है तिरे गेसू-ए-पुर-ख़म में
ये बढ़ती छाँव भी कितनी घनी मालूम होती है

वो अच्छा था जो बेड़ा मौज के रहम ओ करम पर था
ख़िज़र आए तो कश्ती डूबती मालूम होती है

ये दिल की तिश्नगी है या नज़र की प्यास है साक़ी
हर इक बोतल जो ख़ाली है भरी मालूम होती है

दम-ए-आख़िर मुदावा-ए-दिल-ए-बीमार क्या मअ’नी
मुझे छोड़ो कि मुझ को नींद सी मालूम होती है

दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है
चले आओ जहाँ तक रौशनी मालूम होती है

नसीम-ए-ज़िंदगी के सोज़ से मुरझाई जाती है
ये हस्ती फूल की इक पंखुड़ी मालूम होती है

जिधर देखा ‘नुशूर’ इक आलम-ए-दीगर नज़र आया
मुसीबत में ये दुनिया अजनबी मालूम होती है

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