Mujhse kaha jibril-e-junun ne

मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है
मज़हब तो बस मज़हब-ए-दिल है बाक़ी सब गुमराही है

वो जो हुए फ़िरदौस-बदर तक़्सीर थी वो आदम की मगर
मेरा अज़ाब-ए-दर-बदरी मेरी ना-कर्दा-गुनाही है

संग तो कोई बढ़ के उठाओ शाख़-ए-समर कुछ दूर नहीं
जिस को बुलंदी समझे हो उन हाथों की कोताही है

फिर कोई मंज़र फिर वही गर्दिश क्या कीजे ऐ कू-ए-निगार
मेरे लिए ज़ंजीर-ए-गुलू मेरी आवारा-निगाही है

बहर-ए-ख़ुदा ख़ामोश रहो बस देखते जाओ अहल-ए-नज़र
क्या लग़्ज़ीदा-क़दम हैं उस के क्या दुज़दीदा-निगाही है

दीद के क़ाबिल है तो सही ‘मजरूह’ तिरी मस्ताना-रवी
गर्द-ए-हवा है रख़्त-ए-सफ़र रस्ते का शजर हम-राही है

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Ao ab mil ke gulistan ko

आओ अब मिल के गुलिस्ताँ को गुल्सिताँ कर दें
हर गुल-ओ-लाला को रक़्साँ ओ ग़ज़ल-ख़्वाँ कर दें

अक़्ल है फ़ित्ना-ए-बेदार सुला दें इस को
इश्क़ की जिंस-ए-गिराँ-माया को अर्ज़ां कर दें

दस्त-ए-वहशत में ये अपना ही गरेबाँ कब तक
ख़त्म अब सिलसिला-ए-चाक-ए-गरेबाँ कर दें

ख़ून-ए-आदम पे कोई हर्फ़ न आने पाए
जिन्हें इंसाँ नहीं कहते उन्हें इंसाँ कर दें

दामन-ए-ख़ाक पे ये ख़ून के छींटे कब तक
इन्हीं छींटों को बहिश्त-ए-गुल-ओ-रैहाँ कर दें

माह ओ अंजुम भी हों शर्मिंदा-ए-तनवीर ‘मजाज़’
दश्त-ए-ज़ुल्मात में इक ऐसा चराग़ाँ कर दें

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kuchh na kuchh ishq ki tasir ka iqrar to hai

कुछ न कुछ इश्क़ की तासीर का इक़रार तो है
उस का इल्ज़ाम-ए-तग़ाफ़ुल पे कुछ इंकार तो है

हर फ़रेब-ए-ग़म-ए-दुनिया से ख़बर-दार तो है
तेरा दीवाना किसी काम में हुश्यार तो है

देख लेते हैं सभी कुछ तिरे मुश्ताक़-ए-जमाल
ख़ैर दीदार न हो हसरत-ए-दीदार तो है

माअ’रके सर हों उसी बर्क़-ए-नज़र से ऐ हुस्न
ये चमकती हुई चलती हुइ तलवार तो है

सर पटकने को पटकता है मगर रुक रुक कर
तेरे वहशी को ख़याल-ए-दर-ओ-दीवार तो है

इश्क़ का शिकवा-ए-बेजा भी न बे-कार गया
न सही जौर मगर जौर का इक़रार तो है

तुझ से हिम्मत तो पड़ी इश्क़ को कुछ कहने की
ख़ैर शिकवा न सही शुक्र का इज़हार तो है

इस में भी राबता-ए-ख़ास की मिलती है झलक
ख़ैर इक़रार-ए-मोहब्बत न हो इंकार तो है

क्यूँ झपक जाती है रह रह के तिरी बर्क़-ए-निगाह
ये झिजक किस लिए इक कुश्ता-ए-दीदार तो है

कई उन्वान हैं मम्नून-ए-करम करने के
इश्क़ में कुछ न सही ज़िंदगी बे-कार तो है

सहर-ओ-शाम सर-ए-अंजुमन-ए-नाज़ न हो
जल्वा-ए-हुस्न तो है इश्क़-ए-सियहकार तो है

चौंक उठते हैं ‘फ़िराक़’ आते ही उस शोख़ का नाम
कुछ सरासीमगी-ए-इश्क़ का इक़रार तो है

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kai bar is ka daman bhar diya

कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से
मगर दिल है कि इस की ख़ाना-वीरानी नहीं जाती

कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा
मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती

नहीं जाती मता-ए-लाल-ओ-गौहर की गिराँ-याबी
मता-ए-ग़ैरत-ओ-ईमाँ की अर्ज़ानी नहीं जाती

मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से
बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती

सर-ए-खुसरव से नाज़-ए-कज-कुलाही छिन भी जाता है
कुलाह-ए-ख़ुसरवी से बू-ए-सुल्तानी नहीं जाती

ब-जुज़ दीवानगी वाँ और चारा ही कहो क्या है
जहाँ अक़्ल ओ ख़िरद की एक भी मानी नहीं जाती

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