ye hai meri kab naseebi

वही मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी
मिरे काम कुछ न आया ये कमाल-ए-नै-नवाज़ी

मैं कहाँ हूँ तू कहाँ है ये मकाँ कि ला-मकाँ है
ये जहाँ मिरा जहाँ है कि तिरी करिश्मा-साज़ी

इसी कश्मकश में गुज़रीं मिरी ज़िंदगी की रातें
कभी सोज़-ओ-साज़-ए-‘रूमी’ कभी पेच-ओ-ताब-ए-‘राज़ी’

वो फ़रेब-ख़ुर्दा शाहीं कि पला हो करगसों में
उसे क्या ख़बर कि क्या है रह-ओ-रस्म-ए-शाहबाज़ी

न ज़बाँ कोई ग़ज़ल की न ज़बाँ से बा-ख़बर मैं
कोई दिल-कुशा सदा हो अजमी हो या कि ताज़ी

नहीं फ़क़्र ओ सल्तनत में कोई इम्तियाज़ ऐसा
ये सिपह की तेग़-बाज़ी वो निगह की तेग़-बाज़ी

कोई कारवाँ से टूटा कोई बद-गुमाँ हरम से
कि अमीर-ए-कारवाँ में नहीं ख़ू-ए-दिल-नवाज़ी

Read More...

moziza aisa bhi hota hai

इरादा हो अटल तो मोजज़ा ऐसा भी होता है
दिए को ज़िंदा रखती है हवा ऐसा भी होता है

सुनाई दे न ख़ुद अपनी सदा ऐसा भी होता है
मियाँ तंहाई का इक सानेहा ऐसा भी होता है

छिड़े हैं तार दिल के ख़ाना-बर्बादी के नग़्मे हैं
हमारे घर में साहिब रत-जगा ऐसा भी होता है

बहुत हस्सास होने से भी शक को राह मिलती है
कहीं अच्छा तो लगता है बुरा ऐसा भी होता है

किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ
तो शायद ये समझ पाओ ख़ुदा ऐसा भी होता है

ज़बाँ पर आ गए छाले मगर ये तो खुला हम पर
बहुत मीठे फलों का ज़ाइक़ा ऐसा भी होता है

Read More...

meri ek koshish hai pane ki

मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए
बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए

रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल
मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए

वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया
इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए

आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से
इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए

छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद
मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए

देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना
तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए

मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में
अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए

Read More...

dekhe kareeb se bhi

देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे

अब भीक माँगने के तरीक़े बदल गए
लाज़िम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे

नेज़े पे रख के और मिरा सर बुलंद कर
दुनिया को इक चराग़ तो जलता दिखाई दे

दिल में तिरे ख़याल की बनती है इक धनक
सूरज सा आईने से गुज़रता दिखाई दे

चल ज़िंदगी की जोत जगाए अजब नहीं
लाशों के दरमियाँ कोई रस्ता दिखाई दे

क्या कम है कि वजूद के सन्नाटे में ‘ज़फ़र’
इक दर्द की सदा है कि ज़िंदा दिखाई दे

Read More...

hum unke dar pe rahte

हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते
उन्हें ख़ुदा न बनाते तो और क्या करते

बग़ैर इश्क़ अँधेरे में थी तिरी दुनिया
चराग़-ए-दिल न जलाते तो और क्या करते

हमें तो उस लब-ए-नाज़ुक को देनी थी ज़हमत
अगर न बात बढ़ाते तो और क्या करते

ख़ता कोई नहीं पीछा किए हुए दुनिया
जो मय-कदे में न जाते तो और क्या करते

अंधेरा माँगने आया था रौशनी की भीक
हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते

किसी से बात जो की है तो वो ख़फ़ा हैं ‘नज़ीर’
किसी को दोस्त बनाते तो और क्या करते

Read More...

mai diwana ho gya

एक दीवाने को आज आए हैं समझाने कई
पहले मैं दीवाना था और अब हैं दीवाने कई

अक़्ल बढ़ कर बन गई थी दर्द-ए-सर जाते कहाँ
आ गए दीवानगी की हद में फ़रज़ाने कई

सारी दुनिया आ रही है देखने के वास्ते
सर-फिरों ने एक कर डाले हैं वीराने कई

क्या हमारे दौर के कुछ पीने वाले उठ गए
आज ख़ाली क्यों नज़र आते हैं पैमाने कई

मुझ को चुप रहना पड़ा सिर्फ़ आप का मुँह देख कर
वर्ना महफ़िल में थे मेरे जाने पहचाने कई

किस तरह वो दिन भुलाऊँ जिस बुरे दिन का शरीक
एक भी अपना नहीं था और बेगाने कई

मैं वो काशी का मुसलमाँ हूँ कि जिस को ऐ ‘नज़ीर’
अपने घेरे में लिए रहते हैं बुत-ख़ाने कई

Read More...

ho gye nakam to pachhtaye kya

हो गए नाकाम तो पछताएँ क्या
दोस्तों के सामने शरमाएँ क्या

हो रहे हैं फ़ेल हम दो साल से
घर में जा कर अपना मुँह दिखलाएँ क्या

जब किसी सूरत नहीं इस से मफ़र
इम्तिहाँ के नाम से घबराएँ क्या

याद कर लें आज थोड़ा सा सबक़
मास्टर साहब के डंडे खाएँ क्या

जब गुरु जी ख़ुद नहीं समझे सवाल
अपने शागिर्दों को वो समझाएँ क्या

पढ़ नहीं सकते तो शैतानी करें
आ गए स्कूल में तो जाएँ क्या

आओ हम आपस में कुछ झगड़ा करें
खेल से अब अपना दिल बहलाएँ क्या

पूछते हैं मास्टर हम कौन हैं
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या

जब कहीं ज़ौक़-ए-सुख़न-फ़हमी नहीं
‘कैफ़’ साहब की ग़ज़ल हम गाएँ क्या

Read More...

akal hairan hai kya takaza hai

अक़्ल हैरान है रहमत का तक़ाज़ा क्या है
दिल को तक़्सीर की तर्ग़ीब तमाशा क्या है

उन्हें जब ग़ौर से देखा तो न देखा उन को
मक़्सद उस पर्दे का इक दीदा-ए-बीना क्या है

हम शहादत का जुनूँ सर में लिए फिरते हैं
हम मुजाहिद हैं हमें मौत का खटका क्या है

उड़ता फिरता हूँ मैं सहरा में बगूले की तरह
कुछ नहीं इल्म मिरा मलजा-ओ-मावा क्या है

मेरा मंशा है कि दुनिया से किनारा कर लूँ
ऐ ग़म-ए-दोस्त बता तेरा इरादा क्या है

बात पुर-पेच हँसी लब पे शिकन माथे पर
दिल समझने से है क़ासिर ये मुअ’म्मा क्या है

जो तिरी ज़ुल्फ़ पे जा कर न खिले फूल वो क्या
जो न उलझे तिरे दामन से वो काँटा क्या है

एक खिलता हुआ गुलशन है तुम्हारा पैकर
तुम तबस्सुम ही तबस्सुम हो तुम्हारा क्या है

मैं ने इक बात जो पूछी तो बिगड़ कर बोले
बद-गुमानी के सिवा आप ने सीखा क्या है

वो फ़क़ीरों को नवाज़ें न नवाज़ें ऐ ‘चर्ख़’
हम दुआ दे के चले आएँगे अपना क्या है

Read More...

saze hasti ka azab josh hai

साज़-ए-हस्ती का अजब जोश नज़र आता है
इक ज़माना हमा-तन-गोश नज़र आता है

हसरत-ए-जल्वा-ए-दीदार हो पूरी क्यूँकर
वो तसव्वुर में भी रू-पोश नज़र आता है

देखते जाओ ज़रा शहर-ए-ख़मोशाँ का समाँ
कि ज़माना यहाँ ख़ामोश नज़र आता है

आप के नश्तर-ए-मिज़्गाँ को चुभो लेता हूँ
ख़ून-ए-दिल में जो कभी जोश नज़र आता है

आप ही सिर्फ़ जफ़ा-कोश नज़र आते हैं
सारा आलम तो वफ़ा-कोश नज़र आता है

मौसम-ए-गुल न रहा दिल न रहा जी न रहा
फिर भी वहशत का वही जोश नज़र आता है

शाना-ए-यार पे बिखरी तो नहीं ज़ुल्फ़-ए-दराज़
हर कोई ख़ानुमाँ बर-दोश नज़र आता है

जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-बारी का मुअम्मा न खुला
रू-ब-रू रह के भी रू-पोश नज़र आता है

फिर ज़रा ख़ंजर-ए-क़ातिल को ख़बर दे कोई
ख़ून-ए-‘बिस्मिल’ में वही जोश नज़र आता है

Read More...

hashino ke sitam ko kya kahna

हसीनों के सितम को मेहरबानी कौन कहता है
अदावत को मोहब्बत की निशानी कौन कहता है

ये है इक वाक़ई तफ़्सील मेरी आप-बीती की
बयान-ए-दर्द-ए-दिल को इक कहानी कौन कहता है

यहाँ हर-दम नए जल्वे यहाँ हर-दम नए मंज़र
ये दुनिया है नई इस को पुरानी कौन कहता है

तुझे जिस का नशा हर-दम लिए फिरता है जन्नत में
बता ऐ शैख़ उस कौसर को पानी कौन कहता है

तरीक़ा ये भी है इक इम्तिहान-ए-जज़्बा-ए-दिल का
तुम्हारी बे-रुख़ी को बद-गुमानी कौन कहता है

बला है क़हर है आफ़त है फ़ित्ना है क़यामत का
हसीनों की जवानी को जवानी कौन कहता है

फ़ना हो कर भी हासिल है वही रंग-ए-बक़ा उस का
हमारी हस्ती-ए-फ़ानी को फ़ानी कौन कहता है

हज़ारों रंज इस में ‘अर्श’ लाखों कुल्फ़तें इस में
मोहब्बत को सुरूद-ए-ज़िंदगानी कौन कहता है

Read More...