hum unke dar pe rahte Hindi Ghazal | Urdu Ghazal – Ghazal.

हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते
उन्हें ख़ुदा न बनाते तो और क्या करते

बग़ैर इश्क़ अँधेरे में थी तिरी दुनिया
चराग़-ए-दिल न जलाते तो और क्या करते

हमें तो उस लब-ए-नाज़ुक को देनी थी ज़हमत
अगर न बात बढ़ाते तो और क्या करते

ख़ता कोई नहीं पीछा किए हुए दुनिया
जो मय-कदे में न जाते तो और क्या करते

अंधेरा माँगने आया था रौशनी की भीक
हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते

किसी से बात जो की है तो वो ख़फ़ा हैं ‘नज़ीर’
किसी को दोस्त बनाते तो और क्या करते

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mai diwana ho gya

एक दीवाने को आज आए हैं समझाने कई
पहले मैं दीवाना था और अब हैं दीवाने कई

अक़्ल बढ़ कर बन गई थी दर्द-ए-सर जाते कहाँ
आ गए दीवानगी की हद में फ़रज़ाने कई

सारी दुनिया आ रही है देखने के वास्ते
सर-फिरों ने एक कर डाले हैं वीराने कई

क्या हमारे दौर के कुछ पीने वाले उठ गए
आज ख़ाली क्यों नज़र आते हैं पैमाने कई

मुझ को चुप रहना पड़ा सिर्फ़ आप का मुँह देख कर
वर्ना महफ़िल में थे मेरे जाने पहचाने कई

किस तरह वो दिन भुलाऊँ जिस बुरे दिन का शरीक
एक भी अपना नहीं था और बेगाने कई

मैं वो काशी का मुसलमाँ हूँ कि जिस को ऐ ‘नज़ीर’
अपने घेरे में लिए रहते हैं बुत-ख़ाने कई

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ho gye nakam to pachhtaye kya Hindi Ghazal | Urdu Ghazal – Ghazal.

हो गए नाकाम तो पछताएँ क्या
दोस्तों के सामने शरमाएँ क्या

हो रहे हैं फ़ेल हम दो साल से
घर में जा कर अपना मुँह दिखलाएँ क्या

जब किसी सूरत नहीं इस से मफ़र
इम्तिहाँ के नाम से घबराएँ क्या

याद कर लें आज थोड़ा सा सबक़
मास्टर साहब के डंडे खाएँ क्या

जब गुरु जी ख़ुद नहीं समझे सवाल
अपने शागिर्दों को वो समझाएँ क्या

पढ़ नहीं सकते तो शैतानी करें
आ गए स्कूल में तो जाएँ क्या

आओ हम आपस में कुछ झगड़ा करें
खेल से अब अपना दिल बहलाएँ क्या

पूछते हैं मास्टर हम कौन हैं
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या

जब कहीं ज़ौक़-ए-सुख़न-फ़हमी नहीं
‘कैफ़’ साहब की ग़ज़ल हम गाएँ क्या

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akal hairan hai kya takaza hai

अक़्ल हैरान है रहमत का तक़ाज़ा क्या है
दिल को तक़्सीर की तर्ग़ीब तमाशा क्या है

उन्हें जब ग़ौर से देखा तो न देखा उन को
मक़्सद उस पर्दे का इक दीदा-ए-बीना क्या है

हम शहादत का जुनूँ सर में लिए फिरते हैं
हम मुजाहिद हैं हमें मौत का खटका क्या है

उड़ता फिरता हूँ मैं सहरा में बगूले की तरह
कुछ नहीं इल्म मिरा मलजा-ओ-मावा क्या है

मेरा मंशा है कि दुनिया से किनारा कर लूँ
ऐ ग़म-ए-दोस्त बता तेरा इरादा क्या है

बात पुर-पेच हँसी लब पे शिकन माथे पर
दिल समझने से है क़ासिर ये मुअ’म्मा क्या है

जो तिरी ज़ुल्फ़ पे जा कर न खिले फूल वो क्या
जो न उलझे तिरे दामन से वो काँटा क्या है

एक खिलता हुआ गुलशन है तुम्हारा पैकर
तुम तबस्सुम ही तबस्सुम हो तुम्हारा क्या है

मैं ने इक बात जो पूछी तो बिगड़ कर बोले
बद-गुमानी के सिवा आप ने सीखा क्या है

वो फ़क़ीरों को नवाज़ें न नवाज़ें ऐ ‘चर्ख़’
हम दुआ दे के चले आएँगे अपना क्या है

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Hindi Quotes in Hindi

Hindi Quotes in Hindi

मैं तुम्हें इसलिए सलाह नहीं दे रहा कि मैं ज़्यादा समझदार हूँ
बल्कि इसलिए दे रहा हूँ कि मैंने ज़िंदगी में ग़लतियाँ तुमसे ज़्यादा की हैं

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saze hasti ka azab josh hai

साज़-ए-हस्ती का अजब जोश नज़र आता है
इक ज़माना हमा-तन-गोश नज़र आता है

हसरत-ए-जल्वा-ए-दीदार हो पूरी क्यूँकर
वो तसव्वुर में भी रू-पोश नज़र आता है

देखते जाओ ज़रा शहर-ए-ख़मोशाँ का समाँ
कि ज़माना यहाँ ख़ामोश नज़र आता है

आप के नश्तर-ए-मिज़्गाँ को चुभो लेता हूँ
ख़ून-ए-दिल में जो कभी जोश नज़र आता है

आप ही सिर्फ़ जफ़ा-कोश नज़र आते हैं
सारा आलम तो वफ़ा-कोश नज़र आता है

मौसम-ए-गुल न रहा दिल न रहा जी न रहा
फिर भी वहशत का वही जोश नज़र आता है

शाना-ए-यार पे बिखरी तो नहीं ज़ुल्फ़-ए-दराज़
हर कोई ख़ानुमाँ बर-दोश नज़र आता है

जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-बारी का मुअम्मा न खुला
रू-ब-रू रह के भी रू-पोश नज़र आता है

फिर ज़रा ख़ंजर-ए-क़ातिल को ख़बर दे कोई
ख़ून-ए-‘बिस्मिल’ में वही जोश नज़र आता है

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hashino ke sitam ko kya kahna

हसीनों के सितम को मेहरबानी कौन कहता है
अदावत को मोहब्बत की निशानी कौन कहता है

ये है इक वाक़ई तफ़्सील मेरी आप-बीती की
बयान-ए-दर्द-ए-दिल को इक कहानी कौन कहता है

यहाँ हर-दम नए जल्वे यहाँ हर-दम नए मंज़र
ये दुनिया है नई इस को पुरानी कौन कहता है

तुझे जिस का नशा हर-दम लिए फिरता है जन्नत में
बता ऐ शैख़ उस कौसर को पानी कौन कहता है

तरीक़ा ये भी है इक इम्तिहान-ए-जज़्बा-ए-दिल का
तुम्हारी बे-रुख़ी को बद-गुमानी कौन कहता है

बला है क़हर है आफ़त है फ़ित्ना है क़यामत का
हसीनों की जवानी को जवानी कौन कहता है

फ़ना हो कर भी हासिल है वही रंग-ए-बक़ा उस का
हमारी हस्ती-ए-फ़ानी को फ़ानी कौन कहता है

हज़ारों रंज इस में ‘अर्श’ लाखों कुल्फ़तें इस में
मोहब्बत को सुरूद-ए-ज़िंदगानी कौन कहता है

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bo jo humme tumme karar tha

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही या’नी वा’दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मिरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो

कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तुगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो

हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आप ने वा’दा था
सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो

कहा मैं ने बात वो कोठे की मिरे दिल से साफ़ उतर गई
तो कहा कि जाने मिरी बला तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो बिगड़ना वस्ल की रात का वो न मानना किसी बात का
वो नहीं नहीं की हर आन अदा तुम्हें याद हो कि न याद हो

जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा
मैं वही हूँ ‘मोमिन’-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो

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tabiyat in deno kya hai

तबीअत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मिरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है

सहर होने को है बेदार शबनम होती जाती है
ख़ुशी मंजुमला-ओ-अस्बाब-ए-मातम होती जाती है

क़यामत क्या ये ऐ हुस्न-ए-दो-आलम होती जाती है
कि महफ़िल तो वही है दिल-कशी कम होती जाती है

वही मय-ख़ाना-ओ-सहबा वही साग़र वही शीशा
मगर आवाज़-ए-नोशा-नोश मद्धम होती जाती है

वही हैं शाहिद-ओ-साक़ी मगर दिल बुझता जाता है
वही है शम्अ’ लेकिन रौशनी कम होती जाती है

वही शोरिश है लेकिन जैसे मौज-ए-तह-नशीं कोई
वही दिल है मगर आवाज़ मद्धम होती जाती है

वही है ज़िंदगी लेकिन ‘जिगर’ ये हाल है अपना
कि जैसे ज़िंदगी से ज़िंदगी कम होती जाती है

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