Kab haq parast zahid

कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है
हूरों पे मर रहा है ये शहवत-परस्त है

दिल साफ़ हो तो चाहिए मअ’नी-परस्त हो
आईना ख़ाक साफ़ है सूरत-परस्त है

दरवेश है वही जो रियाज़त में चुस्त हो
तारिक नहीं फ़क़ीर भी राहत-परस्त है

जुज़ ज़ुल्फ़ सूझता नहीं ऐ मुर्ग़-ए-दिल तुझे
ख़ुफ़्फ़ाश तू नहीं है कि ज़ुल्मत-परस्त है

दौलत की रख न मार-ए-सर-ए-गंज से उम्मीद
मूज़ी वो देगा क्या कि जो दौलत-परस्त है

अन्क़ा ने गुम किया है निशाँ नाम के लिए
गुम-गश्ता कौन कहता है शोहरत-परस्त है

ये ‘ज़ौक़’ मय-परस्त है या है सनम-परस्त
कुछ है बला से लेक मोहब्बत-परस्त है

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Ab to Ghabra ke ye kahte Hain

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे

तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की
तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जाएँगे

ख़ाली ऐ चारागरो होंगे बहुत मरहम-दाँ
पर मिरे ज़ख़्म नहीं ऐसे कि भर जाएँगे

पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक क्यूँ कर हम
पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जाएँगे

शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊँ
पर मुझे डर है कि वो देख के डर जाएँगे

हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे

आग दोज़ख़ की भी हो जाएगी पानी पानी
जब ये आसी अरक़-ए-शर्म से तर जाएँगे

नहीं पाएगा निशाँ कोई हमारा हरगिज़
हम जहाँ से रविश-ए-तीर-ए-नज़र जाएँगे

सामने चश्म-ए-गुहर-बार के कह दो दरिया
चढ़ के गर आए तो नज़रों से उतर जाएँगे

लाए जो मस्त हैं तुर्बत पे गुलाबी आँखें
और अगर कुछ नहीं दो फूल तो धर जाएँगे

रुख़-ए-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम
मेहर-ओ-माह नज़रों से यारों की उतर जाएँगे

हम भी देखेंगे कोई अहल-ए-नज़र है कि नहीं
याँ से जब हम रविश-ए-तीर-ए-नज़र जाएँगे

‘ज़ौक़’ जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे

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