Kismat-e-shauq azma na sake

क़िस्मत-ए-शौक़ आज़मा न सके
उन से हम आँख भी मिला न सके

हम से याँ रंज-ए-हिज्र उठ न सका
वाँ वो मजबूर थे वो आ न सके

डर ये था रो न दें कहीं वो उन्हें
हम हँसी में भी गुदगुदा न सके

हम से दिल आप ने उठा तो लिया
पर कहीं और भी लगा न सके

अब कहाँ तुम कहाँ वो रब्त-ए-वफ़ा
याद भी जिस की हम दिला न सके

दिल में क्या क्या थे अर्ज़-ए-हाल के शौक़
उस ने पूछा तो कुछ बता न सके

हम तो क्या भूलते उन्हें ‘हसरत’
दिल से वो भी हमें भुला न सके

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chupke chupke raat din aasu bahana

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

बार बार उठना उसी जानिब निगाह-ए-शौक़ का
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है

तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा
और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ’तन
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है

जान कर सोता तुझे वो क़स्द-ए-पा-बोसी मिरा
और तिरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार-ख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है

मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है

देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है

बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है

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yaad kar bo din jo tera tha

याद कर वो दिन कि तेरा कोई सौदाई न था
बावजूद-ए-हुस्न तू आगाह-ए-रानाई न था

इश्क़-ए-रोज़-अफ़्ज़ूँ पे अपने मुझ को हैरानी न थी
जल्वा-ए-रंगीं पे तुझ को नाज़-ए-यकताई न था

दीद के क़ाबिल थी मेरे इश्क़ की भी सादगी
जबकि तेरा हुस्न सरगर्म-ए-ख़ुद-आराई न था

क्या हुए वो दिन कि महव-ए-आरज़ू थे हुस्न ओ इश्क़
रब्त था दोनों में गो रब्त-ए-शनासाई न था

तू ने ‘हसरत’ की अयाँ तहज़ीब-ए-रस्म-ए-आशिक़ी
इस से पहले ए’तिबार-ए-शान-ए-रुस्वाई न था

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dar-e-dil ki unhe kya khabar

दर्द-ए-दिल की उन्हें ख़बर न हुई
कोई तदबीर कारगर न हुई

कोशिशें हम ने कीं हज़ार मगर
इश्क़ में एक मो’तबर न हुई

कर चुके हम को बे-गुनाह शहीद
आप की आँख फिर भी तर न हुई

ना-रसा आह-ए-आशिक़ाँ वो कहाँ
दूर उन से जो बे-असर न हुई

आई बुझने को अपनी शम-ए-हयात
शब-ए-ग़म की मगर सहर न हुई

शब थे हम गर्म-ए-नाला-हा-ए-फ़िराक़
सुब्ह इक आह-ए-सर्द सर न हुई

तुम से क्यूँकर वो छुप सके ‘हसरत’
निगह-ए-शौक़ पर्दा दर न हुई

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ye hai tera diwana

ख़ू समझ में नहीं आती तिरे दीवानों की
दामनों की न ख़बर है न गिरेबानों की

जल्वा-ए-साग़र-ओ-मीना है जो हमरंग-ए-बहार
रौनक़ें तुर्फ़ा तरक़्क़ी पे हैं मय-ख़ानों की

हर तरफ़ बे-ख़ुदी ओ बे-ख़बरी की है नुमूद
क़ाबिल-ए-दीद है दुनिया तिरे हैरानों की

सहल इस से तो यही है कि सँभालें दिल को
मिन्नतें कौन करे आप के दरबानों की

आँख वाले तिरी सूरत पे मिटे जाते हैं
शम-ए-महफ़िल की तरफ़ भीड़ है परवानों की

ऐ जफ़ाकार तिरे अहद से पहले तो न थी
कसरत इस दर्जा मोहब्बत के पशीमानों की

राज़-ए-ग़म से हमें आगाह किया ख़ूब किया
कुछ निहायत ही नहीं आप के एहसानों की

दुश्मन-ए-अहल-ए-मुरव्वत है वो बेगाना-ए-उन्स
शक्ल परियों की है ख़ू भी नहीं इंसानों की

हमरह-ए-ग़ैर मुबारक उन्हें गुल-गश्त-ए-चमन
सैर हम को भी मयस्सर है बयाबानों की

इक बखेड़ा है नज़र में सर-ओ-सामान-ए-वजूद
अब ये हालत है तिरे सोख़्ता-सामानों की

फ़ैज़-ए-साक़ी की अजब धूम है मय-ख़ानों में
हर तरफ़ मय की तलब माँग है पैमानों की

आशिक़ों ही का जिगर है कि हैं ख़ुरसन्द-ए-जफ़ा
काफ़िरों की है ये हिम्मत न मुसलमानों की

याद फिर ताज़ा हुई हाल से तेरे ‘हसरत’
क़ैस ओ फ़रहाद के गुज़रे हुए अफ़्सानों की

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wasl ki banti hai

वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कहीं
आरज़ूओं से फिरा करती हैं तक़दीरें कहीं

बे-ज़बानी तर्जुमान-ए-शौक़ बेहद हो तो हो
वर्ना पेश-ए-यार काम आती हैं तक़रीरें कहीं

मिट रही हैं दिल से यादें रोज़गार-ए-ऐश की
अब नज़र काहे को आएँगी ये तस्वीरें कहीं

इल्तिफ़ात-ए-यार था इक ख़्वाब-ए-आग़ाज़-ए-वफ़ा
सच हुआ करती हैं इन ख़्वाबों की ताबीरें कहीं

तेरी बे-सब्री है ‘हसरत’ ख़ामकारी की दलील
गिर्या-ए-उश्शाक़ में होती हैं तासीरें कहीं

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tere dard se jisko nisbat nhi

तिरे दर्द से जिस को निस्बत नहीं है
वो राहत मुसीबत है राहत नहीं है

जुनून-ए-मोहब्बत का दीवाना हूँ मैं
मिरे सर में सौदा-ए-हिकमत नहीं है

तिरे ग़म की दुनिया में ऐ जान-ए-आलम
कोई रूह महरूम-ए-राहत नहीं है

मुझे गरम-ए-नज़्ज़ारा देखा तो हँस कर
वो बोले कि इस की इजाज़त नहीं है

झुकी है तिरे बार-ए-इरफ़ाँ से गर्दन
हमें सर उठाने की फ़ुर्सत नहीं है

ये है उन के इक रू-ए-रंगीं का परतव
बहार-ए-तिलिस्म-ए-लताफ़त नहीं है

तिरे सरफ़रोशों में है कौन ऐसा
जिसे दिल से शौक़-ए-शहादत नहीं है

तग़ाफ़ुल का शिकवा करूँ उन से क्यूँकर
वो कह देंगे तू बे-मुरव्वत नहीं है

वो कहते हैं शोख़ी से हम दिलरुबा हैं
हमें दिल नवाज़ी की आदत नहीं है

शहीदान-ए-ग़म हैं सुबुक रूह क्या क्या
कि उस दिल पे बार-ए-नदामत नहीं है

नमूना है तक्मील-ए-हुस्न-ए-सुख़न का
गुहर बारी-ए-तबा-ए-हसरत नहीं है

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jab nazar basar ho

जो वो नज़र बसर-ए-लुत्फ़ आम हो जाए
अजब नहीं कि हमारा भी काम हो जाए

शराब-ए-शौक़ की क़ीमत है नक़्द-ए-जान-ए-अज़ीज़
अगर ये बाइस-ए-कैफ़-ए-दवाम हो जाए

रहीन-ए-यास रहें अहल-ए-आरज़ू कब तक
कभी तो आप का दरबार आम हो जाए

जो और कुछ हो तिरी दीद के सिवा मंज़ूर
तो मुझ पे ख़्वाहिश-ए-जन्नत हराम हो जाए

वो दूर ही से हमें देख लें यही है बहुत
मगर क़ुबूल हमारा सलाम हो जाए

अगर वो हुस्न-ए-दिल-आरा कभी हो जल्वा फ़रोश
फ़रोग़-ए-नूर में गुम ज़र्फ़-ए-बाम हो जाए

सुना है बरसर-ए-बख़ि़्शश है आज पीर मुग़ाँ
हमें भी काश अता कोई जाम हो जाए

तिरे करम पे है मौक़ूफ़ कामरानी-ए-शौक़
ये ना-तमाम इलाही तमाम हो जाए

सितम के बाद करम है जफ़ा के बाद अता
हमें है बस जो यही इल्तिज़ाम हो जाए

अता हो सोज़ वो या रब जुनून-ए-‘हसरत’ को
कि जिस से पुख़्ता ये सौदा-ए-ख़ाम हो जाए

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luft ki unse iltiza na kar

लुत्फ़ की उन से इल्तिजा न करें
हम ने ऐसा कभी किया न करें

मिल रहेगा जो उन से मिलना है
लब को शर्मिंदा-ए-दुआ न करें

सब्र मुश्किल है आरज़ू बेकार
क्या करें आशिक़ी में क्या न करें

मस्लक-ए-इश्क़ में है फ़िक्र हराम
दिल को तदबीर-आश्ना न करें

भूल ही जाएँ हम को ये तो न हो
लोग मेरे लिए दुआ न करें

मर्ज़ी-ए-यार के ख़िलाफ़ न हो
कौन कहता है वो जफ़ा न करें

शौक़ उन का सो मिट चुका ‘हसरत’
क्या करें हम अगर वफ़ा न करें

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kismat ko kya malom

क़िस्मत-ए-शौक़ आज़मा न सके
उन से हम आँख भी मिला न सके

हम से याँ रंज-ए-हिज्र उठ न सका
वाँ वो मजबूर थे वो आ न सके

डर ये था रो न दें कहीं वो उन्हें
हम हँसी में भी गुदगुदा न सके

हम से दिल आप ने उठा तो लिया
पर कहीं और भी लगा न सके

अब कहाँ तुम कहाँ वो रब्त-ए-वफ़ा
याद भी जिस की हम दिला न सके

दिल में क्या क्या थे अर्ज़-ए-हाल के शौक़
उस ने पूछा तो कुछ बता न सके

हम तो क्या भूलते उन्हें ‘हसरत’
दिल से वो भी हमें भुला न सके

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