har dushman-e-wafa mujhe mahbub ho gaya

हर दुश्मन-ए-वफ़ा मुझे महबूब हो गया
जो मोजज़ा हुआ वो बहुत ख़ूब हो गया

इश्क़ एक सीधी-सादी सी मंतिक़ की बात है
रग़बत मुझे हुई तो वो मर्ग़ूब हो गया

दीवानगी बग़ैर हयात इतनी तल्ख़ थी
जो शख़्स भी ज़हीन था मज्ज़ूब हो गया

मुजरिम था जो वो अपनी ज़ेहानत से बच गया
जिस से ख़ता न की थी वो मस्लूब हो गया

वो ख़त जो उस के हाथ से पुर्ज़े हुआ ‘अदम’
दुनिया का सब से क़ीमती मक्तूब हो गया

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bahut se logon ko gham ne jila ke

बहुत से लोगों को ग़म ने जिला के मार दिया
जो बच रहे थे उन्हें मय पिला के मार दिया

ये क्या अदा है कि जब उन की बरहमी से हम
न मर सके तो हमें मुस्कुरा के मार दिया

न जाते आप तो आग़ोश क्यूँ तही होती
गए तो आप ने पहलू से जा के मार दिया

मुझे गिला तो नहीं आप के तग़ाफ़ुल से
मगर हुज़ूर ने हिम्मत बढ़ा के मार दिया

न आप आस बँधाते न ये सितम होता
हमें तो आप ने अमृत पिला के मार दिया

किसी ने हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल से जाँ तलब कर ली
किसी ने लुत्फ़ के दरिया बहा के मार दिया

जिसे भी मैं ने ज़ियादा तपाक से देखा
उसी हसीन ने पत्थर उठा के मार दिया

वो लोग माँगेंगे अब ज़ीस्त किस के आँचल से?
जिन्हें हुज़ूर ने दामन छुड़ा के मार दिया

चले तो ख़ंदा-मिज़ाजी से जा रहे थे हम
किसी हसीन ने रस्ते में आ के मार दिया

रह-ए-हयात में कुछ ऐसे पेच-ओ-ख़म तो न थे
किसी हसीन ने रस्ते में आ के मार दिया

करम की सूरत-ए-अव्वल तो जाँ-गुदाज़ न थी
करम का दूसरा पहलू दिखा के मार दिया

अजीब रस-भरा रहज़न था जिस ने लोगों को
तरह तरह की अदाएँ दिखा के मार दिया

अजीब ख़ुल्क़ से इक अजनबी मुसाफ़िर ने
हमें ख़िलाफ़-ए-तवक़्क़ो बुला के मार दिया

‘अदम’ बड़े अदब-आदाब से हसीनों ने
हमें सितम का निशाना बना के मार दिया

तअ’य्युनात की हद तक तो जी रहा था ‘अदम’
तअ’य्युनात के पर्दे उठा के मार दिया

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khush ho ki jindagi ne koi kaam kiya

ख़ुश हूँ कि ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया
मुझ को सुपुर्द-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कर दिया

साक़ी सियाह-ख़ाना-ए-हस्ती में देखना
रौशन चराग़ किस ने सर-ए-शाम कर दिया

पहले मिरे ख़ुलूस को देते रहे फ़रेब
आख़िर मिरे ख़ुलूस को बदनाम कर दिया

कितनी दुआएँ दूँ तिरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
कितना वसीअ सिलसिला-ए-दाम कर दिया

वो चश्म-ए-मस्त कितनी ख़बर-दार थी ‘अदम’
ख़ुद होश में रही हमें बदनाम कर दिया

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khali hai abhi jaam mai kuchh soch raha ho

ख़ाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ
ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मैं कुछ सोच रहा हूँ

साक़ी तुझे इक थोड़ी सी तकलीफ़ तो होगी
साग़र को ज़रा थाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

पहले बड़ी रग़बत थी तिरे नाम से मुझ को
अब सुन के तिरा नाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

इदराक अभी पूरा तआ’वुन नहीं करता
दय बादा-ए-गुलफ़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

हल कुछ तो निकल आएगा हालात की ज़िद का
ऐ कसरत-ए-आलाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

फिर आज ‘अदम’ शाम से ग़मगीं है तबीअ’त
फिर आज सर-ए-शाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

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saki sharab la ki tabiyat udas hai

साक़ी शराब ला कि तबीअ’त उदास है
मुतरिब रुबाब उठा कि तबीअ’त उदास है

रुक रुक के साज़ छेड़ कि दिल मुतमइन नहीं
थम थम के मय पिला कि तबीअ’त उदास है

चुभती है क़ल्ब ओ जाँ में सितारों की रौशनी
ऐ चाँद डूब जा कि तबीअ’त उदास है

मुझ से नज़र न फेर कि बरहम है ज़िंदगी
मुझ से नज़र मिला कि तबीअ’त उदास है

शायद तिरे लबों की चटक से हो जी बहाल
ऐ दोस्त मुस्कुरा कि तबीअ’त उदास है

है हुस्न का फ़ुसूँ भी इलाज-ए-फ़सुर्दगी
रुख़ से नक़ाब उठा कि तबीअ’त उदास है

मैं ने कभी ये ज़िद तो नहीं की पर आज शब
ऐ मह-जबीं न जा कि तबीअ’त उदास है

इमशब गुरेज़-ओ-रम का नहीं है कोई महल
आग़ोश में दर आ कि तबीअ’त उदास है

कैफ़िय्यत-ए-सुकूत से बढ़ता है और ग़म
क़िस्सा कोई सुना कि तबीअ’त उदास है

यूँही दुरुस्त होगी तबीअ’त तिरी ‘अदम’
कम-बख़्त भूल जा कि तबीअ’त उदास है

तौबा तो कर चुका हूँ मगर फिर भी ऐ ‘अदम’
थोड़ा सा ज़हर ला कि तबीअ’त उदास है

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aaj fir rooh me ek burq si hai

आज फिर रूह में इक बर्क़ सी लहराती है
दिल की गहराई से रोने की सदा आती है

यूँ चटकती हैं ख़राबात में जैसे कलियाँ
तिश्नगी साग़र-ए-लबरेज़ से टकराती है

शोला-ए-ग़म की लपक और मिरा नाज़ुक सा मिज़ाज
मुझ को फ़ितरत के रवय्ये पे हँसी आती है

मौत इक अम्र-ए-मुसल्लम है तो फिर ऐ साक़ी
रूह क्यूँ ज़ीस्त के आलाम से घबराती है

सो भी जा ऐ दिल-ए-मजरूह बहुत रात गई
अब तो रह रह के सितारों को भी नींद आती है

और तो दिल को नहीं है कोई तकलीफ़ ‘अदम’
हाँ ज़रा नब्ज़ किसी वक़्त ठहर जाती है

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maikada tha chandi thi

मय-कदा था चाँदनी थी मैं न था
इक मुजस्सम बे-ख़ुदी थी मैं न था

इश्क़ जब दम तोड़ता था तुम न थे
मौत जब सर धुन रही थी मैं न था

तूर पर छेड़ा था जिस ने आप को
वो मिरी दीवानगी थी मैं न था

वो हसीं बैठा था जब मेरे क़रीब
लज़्ज़त-हम-सायगी थी मैं न था

मय-कदे के मोड़ पर रुकती हुई
मुद्दतों की तिश्नगी थी मैं न था

थी हक़ीक़त कुछ मिरी तो इस क़दर
उस हसीं की दिल-लगी थी मैं न था

मैं और उस ग़ुंचा-दहन की आरज़ू
आरज़ू की सादगी थी मैं न था

जिस ने मह-पारों के दिल पिघला दिए
वो तो मेरी शाएरी थी मैं न था

गेसुओं के साए में आराम-कश
सर-बरहना ज़िंदगी थी मैं न था

दैर ओ काबा में ‘अदम’ हैरत-फ़रोश
दो-जहाँ की बद-ज़नी थी मैं न था

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lehra ke jhoom jhoom ke la

लहरा के झूम झूम के ला मुस्कुरा के ला
फूलों के रस में चाँद की किरनें मिला के ला

कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं
जा मय-कदे से मेरी जवानी उठा के ला

साग़र-शिकन है शैख़-ए-बला-नोश की नज़र
शीशे को ज़ेर-ए-दामन-ए-रंगीं छुपा के ला

क्यूँ जा रही है रूठ के रंगीनी-ए-बहार
जा एक मर्तबा उसे फिर वर्ग़ला के ला

देखी नहीं है तू ने कभी ज़िंदगी की लहर
अच्छा तो जा ‘अदम’ की सुराही उठा के ला

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toti hai meri need magar tumko kya

टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
बजते रहें हवाओं से दर तुम को इस से क्या

तुम मौज मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते रहो
कट जाएँ मेरी सोच के पर तुम को इस से क्या

औरों का हाथ थामो उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊँ अपना ही घर तुम को इस से क्या

अब्र-ए-गुरेज़-पा को बरसने से क्या ग़रज़
सीपी में बन न पाए गुहर तुम को इस से क्या

ले जाएँ मुझ को माल-ए-ग़नीमत के साथ अदू
तुम ने तो डाल दी है सिपर तुम को इस से क्या

तुम ने तो थक के दश्त में खे़मे लगा लिए
तन्हा कटे किसी का सफ़र तुम को इस से क्या

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Tamasa-e-dair-o-haram dekhte hai

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं
तुझे हर बहाने से हम देखते हैं

हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं
वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं

ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं
हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

फिरे बुत-कदे से तो ऐ अहल-ए-काबा
फिर आ कर तुम्हारे क़दम देखते हैं

हमें चश्म-ए-बीना दिखाती है सब कुछ
वो अंधे हैं जो जाम-ए-जम देखते हैं

न ईमा-ए-ख़्वाहिश न इज़हार-ए-मतलब
मिरे मुँह को अहल-ए-करम देखते हैं

कभी तोड़ते हैं वो ख़ंजर को अपने
कभी नब्ज़-ए-बिस्मिल में दम देखते हैं

ग़नीमत है चश्म-ए-तग़ाफ़ुल भी उन की
बहुत देखते हैं जो कम देखते हैं

ग़रज़ क्या कि समझें मिरे ख़त का मज़मूँ
वो उनवान ओ तर्ज़-ए-रक़म देखते हैं

सलामत रहे दिल बुरा है कि अच्छा
हज़ारों में ये एक दम देखते हैं

रहा कौन महफ़िल में अब आने वाला
वो चारों तरफ़ दम-ब-दम देखते हैं

उधर शर्म हाइल इधर ख़ौफ़ माने
न वो देखते हैं न हम देखते हैं

उन्हें क्यूँ न हो दिलरुबाई से नफ़रत
कि हर दिल में वो ग़म अलम देखते हैं

निगहबाँ से भी क्या हुई बद-गुमानी
अब उस को तिरे साथ कम देखते हैं

हमें ‘दाग़’ क्या कम है ये सरफ़राज़ी
कि शाह-ए-दकन के क़दम देखते हैं

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