Ye Shaki Ki karamat hai ya faize mai parasti hai

ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है
घटा के भेस में मय-ख़ाने पर रहमत बरसती है

ये जो कुछ देखते हैं हम फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती है
तख़य्युल के करिश्मे हैं बुलंदी है न पस्ती है

वहाँ हैं हम जहाँ ‘बेदम’ न वीराना न बस्ती है
न पाबंदी न आज़ादी न हुश्यारी न मस्ती है

तिरी नज़रों पे चढ़ना और तिरे दिल से उतर जाना
मोहब्बत में बुलंदी जिस को कहते हैं वो पस्ती है

वही हम थे कभी जो रात दिन फूलों में तुलते थे
वही हम हैं कि तुर्बत चार फूलों को तरसती है

करिश्मे हैं कि नक़्काश-ए-अज़ल नैरंगियाँ तेरी
जहाँ में माइल-ए-रंग-ए-फ़ना हर नक़्श-ए-हस्ती है

इसे भी नावक-ए-जानाँ तू अपने साथ लेता जा
कि मेरी आरज़ू दिल से निकलने को तरसती है

हर इक ज़र्रे में है इन्नी-अनल्लाह की सदा साक़ी
अजब मय-कश थे जिन की ख़ाक में भी जोश-ए-मस्ती है

ख़ुदा रक्खे दिल-ए-पुर-सोज़ तेरी शोला-अफ़्शानी
कि तू वो शम्अ है जो रौनक़-ए-दरबार-ए-हस्ती है

मिरे दिल के सिवा तू ने भी देखी बेकसी मेरी
कि आबादी न हो जिस में कोई ऐसी भी बस्ती है

हिजाबात-ए-तअय्युन माने-ए-दीदार समझा था
जो देखा तो नक़ाब-ए-रू-ए-जानाँ मेरी हस्ती है

अजब दुनिया-ए-हैरत आलम-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ है
कि वीराने का वीराना है और बस्ती की बस्ती है

कहीं है अब्द की धुन और कहीं शोर-ए-अनल-हक़ है
कहीं इख़्फ़ा-ए-मस्ती है कहीं इज़हार-ए-मस्ती है

बनाया रश्क-ए-महर-ओ-मह तिरी ज़र्रा-नवाज़ी ने
नहीं तो क्या है ‘बेदम’ और क्या ‘बेदम’ की हस्ती है

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Hazrat Maula Ali Ka Farman

मुश्किलतरीन काम बहतरीन लोगों के हिस्से में आते हैं.
क्योंकि वो उसे हल करने की सलाहियत रखते हैं “

“कम खाने में सेहत है, कम बोलने में समझदारी है और कम सोना इबादत है”

कभी तुम दुसरों के लिए दिल से दुवा मांग कर देखो
तुम्हें अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी ..

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Maula Ali Ka Farman

जब तुम्हरी मुख़ालफ़त हद से बढ़ने लगे,
तो समझ लो कि अल्लाह तुम्हें कोई मुक़ाम देने वाला है

झूठ बोलकर जीतने से बेहतर है सच बोलकर हार जाओ।
सब्र को ईमान से वो ही निस्बत है जो सिर को जिस्म से है.

दौलत, हुक़ूमत और मुसीबत में आदमी के अक्ल का इम्तेहान होता है
कि आदमी सब्र करता है या गलत क़दम उठता है.

सब्र एक ऐसी सवारी है जो सवार को अभी गिरने नहीं देती।

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Upcoming Mushaira Jashn-e-Adab

जामिया हमदर्द के साथ साहित्योत्सव ‘जश्न-ए-अदब 2019′ का आयोजन होने जा रहा है जिसमें अमर उजाला काव्य की भी भागीदारी रहेगी। 1 से 3 मार्च 2019 को होने वाले इस कार्यक्रम को जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय में आयोजित किया जा रहा है जिसमें मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की जन्म-शताब्दी का उत्सव मनाया जाएगा। यह कार्यक्रम पूरी तरह से कविता, साहित्य और संस्कृति को समर्पित है।

शुक्रवार 1 मार्च को कार्यक्रम का उद्घाटन किया जाएगा। उसी दिन ‘शाम-ए-सूफ़ीयाना’ का भी आयोजन किया गया है जिसमें कादिर मुस्तफ़ा ख़ान रहेंगे और साथ ही साबरी ब्रदर्स की कव्वाली की भी प्रस्तुति होगी।

कार्यक्रम के दूसरे दिन अशोक चक्रधर, संतोष आनंद जैसी मशहूर हस्तियां मौजूद रहेंगी। साथ ही बैतबाज़ी, यूथ मुशायरा का भी आयोजन होगा। शाम को प्रसिद्ध हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव काव्य मर्म से हास्य शिखर तक पर चर्चा। काव्य-कैफ़े की महफ़िल भी इसी दिन सुबह कार्यक्रम-स्थल पर जमेगी।

तीसरे दिन यतीन्द्र मिश्रा की नई किताब अख़्तरी पर चर्चा होगी। इसके बाद मज़ाहिया मुशायरे का आयोजन है। इसी के समानांतर कन्वेंशन सेन्टर हॉल में जावेद अख़्तर द्वारा मुज़्तर ख़ैराबादी की संकलित किताब गुलशन पर बात होगी। इस दिन शबाना आज़मी, संदीप नाथ, आलोक श्रीवास्तव भी उपस्थित रहेंगे।

कार्यक्रम में फूड कोर्ट के अलावा किताब प्रदर्शनी भी होगी। पास के मेट्रो स्टेशन से शटल की भी व्यवस्था की गयी है। आप इस कार्यक्रम की अपडेट अमर उजाला काव्य के पेज पर देख पाएंगे।

जश्न-ए-अदब
तारीख़- 1,2,3 मार्च 2019
स्थान- जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी, हमदर्द नगर, दिल्ली
प्रवेश- 3,5,6 नम्बर गेट

आप jashneadab.org पर जाकर रजिस्टर कर सकते हैं।

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Pegham saba laye hai gulzar-e-Nabi se

Pegham saba laye hai gulzar-e-Nabi se (salla Llahu ‘alayhi wa sallam)
aaya hai bulawa mujhe darbar-e-Nabi se

her aah gaye arsh pe ye aah ki kismat
her ashk pe aik khuld hai her ashk ki qeemat
tohfa ye mila hai sarkar-e-Nabi se
ayaa hai bulawa mujhe darbare-Nabi se
darbare-Nabi se

bhaati nahi humdum mujhe jannat ki jawaani
sunta nahi zahid us mein hooron ki kahani
ulfat hai mujhe sayaa-e-deewar-e-Nabi se
ayaa hai bulawa mujhe darbare-nabi se
darbare-Nabi se

irfan ki kasak khulq ki mai sabr ka saagar
kiya lutf mila kerta hai jo dete hein sarwar
ye pooch le aake koi beemar-e-Nabi se
aaya hai bulawa mujhe darbar-e-Nabi se

pegham saba laye hai gulzar-e-Nabi se
aaya hai bulawa mujhe darbar-e-Nabi se
darbar-e-Nabi se

pegham saba laye hai gulzar-e-Nabi se
aaya hai bulawa mujhe darbar-e-Nabi se
darbar-e-Nabi se

 

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Apnay daamane shifaat main

Apnay daamane shifaat main chupaye rakhna
Mere sarkaar (salla Llahu ‘alayhi wa sallam) meri baat banaye rakhna

Maine maana ke nikamma hoon magar aap ka hoon
Is nikamme ko bi sarkar nibaye rakhna

Mere sarkaar (salla Llahu ‘alayhi wa sallam) meri baat banaye rakhna
Jab sare hashre sawaaneze pai suuraj aaye
Aapne kamli kai gunahgare pai saye rakhna

Mere sarkaar meri baat banaye rakhna
Un kai aane ki gari hai wo hain aane waaley
Mere sarkar ki mehfil ko sajaye rakhna
Mere sarkaar meri baat banaye rakhna

Zarraye khaak ko khursheed banane waey
Khaak hoon khaak ko kaadmoon sey lagaye rakhna

Mere sarkar (salla Llahu ‘alayhi wa sallam) meri baat banaye rakhna
Apney daamane shifaat main chupaye rakhna

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Aap ke Darbar se

Aap ke Darbar se khali gaya koi nahi
Hain sakhi lakhon yahaan par Aap (salla Llahu ‘alayhi wa sallam) sa koi nahin

Aap ke dohar mein dono jahaan ki nematein
Aap ke lutf-o-karam ki intihaa koi nahin

Jab liya Naam-e-Muhammad (salla Llahu ‘alayhi wa sallam) mushkilein hall ho gayin
Kaun kehta hai ke Tere Naam ka assar nahin

Aye Darbar Dar-e-Yaar-e-Muhammad (salla Llahu ‘alayhi wa sallam) aasiyo
Aitaraf-e-jurm karlo to sazzaa koi nahin

Aap ke hote hue main kyun musibat mein rahon
Kya kaheinge log ke mushkil kusha koi nahin

Kaun buje aye Niyazi dard-e-dil ka majira
Hub-e-Muhammad (salla Llahu ‘alayhi wa sallam) hai humara aasraa koi nahin

Aap ke Darbar se khali gaya koi nahi
Hain sakhi lakhon yahaan par Aap sa koi nahin

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