tera husn bhi hai bahana Hindi ghazal | Urdu Ghazal – Ghazal.

तिरा हुस्न भी बहाना मिरा इश्क़ भी बहाना
ये लतीफ़ इस्तिआरे न समझ सका ज़माना

मैं निसार-ए-दस्त-ए-नाज़ुक जो उठाए नाज़िशाना
कि सँवर गईं ये ज़ुल्फ़ें तो सँवर गया ज़माना

तिरी ज़िंदगी तबस्सुम मिरी ज़िंदगी तलातुम
मिरी ज़िंदगी हक़ीक़त तिरी ज़िंदगी फ़साना

तिरी ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म ने नए सिलसिले निकाले
मिरी सीना-चाकियों से जो बना मिज़ाज-ए-शाना

तिरा नाज़-ए-किब्रियाई भी मक़ाम-ए-ग़ौर में है
कि घटा दिया है सज्दों ने वक़ार-ए-आस्ताना

मैं दरून-ए-ख़ाना आ कर भी लिए हूँ दाग़-ए-सज्दा
है अभी मिरी जबीं पर असर-ए-बरून-ए-ख़ाना

कभी राह मैं ने बदली तो ज़मीं का रक़्स बदला
कभी साँस ली ठहर कर तो ठहर गया ज़माना