Ya Hussain Ya Hussain

आया न होगा इस तरह हुस्नो-शबाब रेत पर
गुलशन-ए-फ़ातिमा के थे सारे गुलाब रेत पर

जान-ए-बतूल के सिवा कोई नहीं खिला सका
कतरा-ए-आब के बग़ैर इतने गुलाब रेत पर

जितने सवाल इश्क़ ने आले-रसूल से किये
एक के बाद एक दिये सारे जवाब रेत पर

इश्क़ में क्या बचाइये, इश्क़ में क्या लुटाइये
आले-नबी ने लिख दिया सारा निसाब रेत पर

प्यासा हुसैन को कहूं इतना तो बे-अदब नहीं
लमसे लबे हुसैन को तरसा है आब रेत पर

आले-नबी का काम था, आले-नबी ही कर गए
कोई न लिख सका अदीब ऐसी किताब रेत पर

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gaflat me kati mori sari umariya

ए सबा ! मुस्तफ़ा से जा केहना ग़म के मारे सलाम केहते हैं
सब्ज़ गुम्बद की उन बहारों को दिल हमारे सलाम केहते हैं

सब्ज़ गुम्बद का आँख में मन्ज़र और तसव्वुर में आप का मिम्बर
सामने झालीयां है रोज़े की, दिल हमारे सलाम केहते हैं

अल्लाह अल्लाह ! हुज़ूर के गेसू, भीनी भीनी महकती वो खुश्बू
जिन से मा’मूर है फ़िज़ा हरसू, वो नज़ारे सलाम केहते हैं

जाइरे-तयबा तू मदीने में प्यारे आक़ा से इतना केह देना
आप की गर्दे-राह को आक़ा, दिल हमारे सलाम केहते हैं

ज़िक्र था आख़री महीने का, तज़किरा छिड़ गया मदीने का
हाजियो ! मुस्तफ़ा से केह देना, बे-सहारे सलाम केहते हैं

ग़म के बादल तमाम छटने लगे, परदे आँखों से सारे हटने लगे
जो तलातुम बने हुवे थे सोहेल, वो किनारे सलाम केहते हैं

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gaflat me kati mori sari umariya

ग़फ़लत में कटी मोरी सकरी उमरिया
करो मो पे अपनी दया ग़ौस-ए-आज़म

ज़माने में नहीं सुनता कोई फ़रियाद जीलानी
ख़ुदारा आप ही कीजे मेरी इमदाद जीलानी

करो इमदाद ऐ लख्ते-दिले-मुश्क़िल-कुशा-हैदर
गिरा हूँ ग़र्दिशों में, हूँ बड़ा नाशाद जीलानी

फ़साने ग़म के तुम से ना कहूं तो फिर कहूं किस से
मेरी सुन लो मेरी सुन लो मेरी रूदाद जीलानी

मेरी शाम-ए-ख़ज़ाँ सुब्हे-बहारा में बदल जाए
रुखे-पुरनूर दिखला कर करो तुम शाद जीलानी

समंदर में ग़मों के पाएगा ये साहिल-ए-तस्कीन
उजागर देख ले आ कर तेरा बग़दाद जीलानी

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Ye sab tumhara Karam hai Aaka ke baat ab tak bani huyi hai

कोई सलीका है आरज़ू का, न बन्दगी मेरी बन्दगी है
ये सब तुम्हारा करम है आक़ा के बात अब तक बनी हुई है

अता किया मुझको दर्दे-उल्फ़त, कहां थी ये पुर-ख़ता की क़िस्मत
मैं इस करम के कहां था क़ाबिल, हुज़ूर की बन्दा परवरी है

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा, जो करम मुझ पे मेरे नबी कर दिया
मैं सजाता हूँ सरकार की महफिलें, मुझ को हर ग़म से रब ने बरी कर दिया

ज़िक्रे-सरकार की हैं बड़ी बरकतें, मिल गई राहतें, अज़मतें, रिफ़अतें
कोई सिद्दिक़, फ़ारूक़, उस्मां हुवे और किसीको नबी ने अली कर दिया

तजल्लियों के कफील तुम हो, मुरादे-क़ल्बे ख़लील तुम हो
ख़ुदा की रोशन दलील तुम हो, ये सब तुम्हारी ही रोशनी है

किसी का एहसान क्यूं उठाएं, किसी को हालात क्यूं बताएं
तुम्हीं से मांगेंगे तुम ही दोगे, तुम्हारे ही दर से लो लगी है

अमल की मेरे असास क्या है, बजुज़ नदामत के पास क्या है
रहे सलामत बस आप की निस्बत, मेरा तो बस आसरा यहीं है

जितना दिया सरकार ने मुझ को उतनी मेरी औक़ात नहीं
ये तो करम है उनका वरना मुझ में तो ऐसी बात नहीं

इश्क़े-शहे-बतहा से पेहले मुफ़लिसो-ख़स्ताहाल था मैं
नामे-मुहम्मद के मैं क़ुरबां, अब वो मेरे हालात नहीं

गौर तो कर सरकार की तुझ पर कितनी ख़ास इनायत है
कौसर तू है इनका सनाख्वां ये मामूली बात नहीं

बशीर कहिये, नज़ीर कहिये, इन्हें सिराजे-मुनीर कहिये
जो सर बसर है कलामे-रब्बी, वो मेरे आक़ा की ज़िन्दगी है

यहीं है ख़ालिद असासे-रहमत, यहीं है ख़ालिद बिनाए-अज़मत
नबी का इरफ़ान बन्दग़ी है, नबी का इरफ़ान ज़िन्दगी है

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Ya rab suye madina ban ke jau

या रब सूए मदीना मस्ताना बन के जाऊं
उस शमअे़-दो-जहां का परवाना बन के जाऊं

उनके सिवा किसी की दिल में न आरज़ू हो
दुनियां की हर तलब से बेगाना बन के जाऊं

हर गाम एक सजदा, हर गाम या ह़बीबी
इस शान, इस अदा का मस्ताना बन के जाऊं

पोहंचूं मदीने काश ! मैं इस बेख़ुदी के साथ
रोता फिरूं गली गली दीवानगी के साथ

जूं ही निग़ाह गुम्बदे-ख़ज़रा को चूमले
क़ुर्बान मेरी जान हो वारफ्तगी के साथ

मुझ को बक़ी-ए-पाक में दो गज़ ज़मीं मिले
या रब दुआ है तुझ से मेरी आजिज़ी के साथ

या रब सूए मदीना मस्ताना बन के जाऊं
उस शमए-दो जहां का परवाना बन के जाऊं

बेहज़ाद अपना आलम समझेगा क्या ज़माना
है फ़ेहम का तकाज़ा दीवाना बन के जाऊं

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bhatki huyi hayat hai

भटकी हुई हयात के रहबर हुसैन हैं
सेहरा हैं करबला तो समन्दर हुसैन हैं

खुशबू पयामे हक की हैं सारे जहान में
गुलज़ार-ए-मुस्तफा के गुल-ए-तर हुसैन हैं

इश्क-ए-हुसैन से मेरी उक़बा संवर गई
सब्र-ओ-रोज़ा के आज भी पैकर हुसैन हैं

बेशक हयात-ओ-मौत का हैं फैसला यही
जी कर यजीद मर गया, घर-घर हुसैन हैं

जान अपनी दे के जिन्दगी बख्शी हैं दीन को
हर दिल का,हर निगाह का मेहवर हुसैन हैं

हैदर के नूर-ए-ईन जिगर गोशा-ए-रसूल
मासूम और बाला-ओ-बरतर हुसैन हैं

‘शहजाद’ उनके दम से ही रौशन हैं कायनात
दीन-ए-मुबीन के माह-ए-मुनव्वर हुसैन हैं

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maula ya salleh wasallam

सहर का वक़्त था मा’सूम कलियाँ मुस्कुराती थीं
हवाएं ख़ैर-मक़दम के तराने गुनगुनाती थी
अभी जिब्रील उतरे भी न थे काअ़बे के मिम्बर से
के इतने में सदा आई ये अब्दुल्लाह के घर से
मुबारक हो ! शहे-हर-दोसरा तशरीफ़ ले आए
मुबारक हो ! मुहम्मद मुस्तफा तशरीफ़ ले आए

मौला या स़ल्ली व सल्लिम दाइमन अबदन
अ़ला ह़बीबिक ख़ैरिल-ख़ल्क़ि कुल्लिहिमि

मुह़म्मदुन सय्यिदुल-कौनैनी वस्सक़लयनि
वल्फरीक़यनि मिन उ़र्बि-व्व-मिन अ़जमी

मौला या स़ल्ली व सल्लिम दाइमन अबदन
अ़ला ह़बीबिक ख़ैरिल-ख़ल्क़ि कुल्लिहिमि

वो मुह़म्मद फ़ख़्रे-आलम, हादी-ए-कुल-इन्स-ओ-जां
सरवरे-कोनैन, सुल्ताने-अरब, शाहे-अजम
एक दिन जिब्रील से कहने लगे शाहे-उमम
तूमने देखा है जहां, बतलाओ तो कैसे हैं हम?
अर्ज़ की जिब्रील ने ए शाहे-दीं ! ए मोह़तरम !
आपका कोई मुमासिल ही नहीं रब की क़सम

मौला या स़ल्ली व सल्लिम दाइमन अबदन
अ़ला ह़बीबिक ख़ैरिल-ख़ल्क़ि कुल्लिहिमि

रसूलल्लाह, ह़बीबल्लाह, इमामल-मुर्सलीन
रसूलल्लाह, ह़बीबल्लाह, इमामल-मुर्सलीन

हुवल-ह़बीबुल्लज़ी तुरजा शफ़ाअ़तुहु
लिकुल्लि हौलि-म्मिनल-अहवालि मुक़्तह़िमि

मौला या स़ल्ली व सल्लिम दाइमन अबदन
अ़ला ह़बीबिक ख़ैरिल-ख़ल्क़ि कुल्लिहिमि

मेरे मौला सदा तह़िय्यतो-दुरूद के गजरे
अपने मह़बूब पर जो है तेरी तख़लीक़ बेहतरीं
उसी महबूब से वाबस्ता उम्मीदे-शफ़ाअ़त है
के हर हिम्मत-शिकन-मुश्किल में जिस ने दस्तगीरी की
न कोई आप जैसा था, न कोई आप जैसा है
कोई युसूफ से पूछे मुस्तफ़ा का हुस्न कैसा है
ज़मीनो-आसमां में कोई भी मिसाल ना मिली

मौला या स़ल्ली व सल्लिम दाइमन अबदन
अ़ला ह़बीबिक ख़ैरिल-ख़ल्क़ि कुल्लिहिमि

रसूलल्लाह, ह़बीबल्लाह, इमामल-मुर्सलीन
रसूलल्लाह, ह़बीबल्लाह, इमामल-मुर्सलीन

या रब्बि बिल-मुस्त़फ़ा बल्लिग़ मक़ास़िदना
वग़फिर लना मा मद़ा या वासिअ़ल-करमी

मौला या स़ल्ली व सल्लिम दाइमन अबदन
अ़ला ह़बीबिक ख़ैरिल-ख़ल्क़ि कुल्लिहिमि

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ye kon aaya jiska jikr h

करम के बादल बरस रहे हैं, दिलों की खेती हरी भरी है
ये कौन आया के ज़िक्र जिस का नगर नगर है गली गली है

ये कौन बन कर क़रार आया, ये कौन जाने-बहार आया
गुलों के चेहरे हैं निखरे निखरे, कली कली में शगुफ़्तगी है

दीये दिलों के जलाए रखना, नबी की महफ़िल सजाए रखना
जो राहते-दिल सुकूने-जां है, वो ज़िक्र ज़िक्रे-मुहम्मदी है

नबी को अपना ख़ुदा न मानो, मगर ख़ुदा से जुदा न जानो
है अहले-ईमां का ये अक़ीदा, ख़ुदा ख़ुदा है, नबी नबी है

न मांगो दुनिया के तुम ख़ज़ीने, चलो नियाज़ी चले मदीने
के बादशाही से बढ़के प्यारे ! नबी के दर की गदागरी है

करम के बादल बरस रहे हैं, दिलों की खेती हरी भरी है
ये कौन आया के ज़िक्र जिस का नगर नगर है गली गली है

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sukoon paya hai be kasi ne

सुकून पाया है बे-कसी ने, हुदूदे-ग़म से निकल गया हूँ
ख़याले-हज़रत जब आ गया है तो गिरते गिरते संभल गया हूँ

कभी मैं सुबहे-अज़ल गया हूँ, कभी मैं शामे-अबद गया हूँ
तलाशे-जानां में कितनी मंज़िल ख़ुदा ही जाने निकल गया हूँ

हरम की तपती हुई ज़मीं पर जिगर बिछाने की आरज़ू में
बहारे-ख़ुल्दे-बरी मिली तो बचा के दामन निकल गया हूँ

मेरे जनाज़े पे रोने वालो ! फ़रेब में हो, ब-गौर देखो
मरा नहीं हूँ, ग़मे-नबी में लिबासे-हस्ती बदल गया हूँ

ये शान मेरी, ये मेरी क़िस्मत, खुशा मुहब्बत ज़ए अक़ीदत
ज़ुबां पे आते ही नामे-नामी, अदब के सांचे में ढल गया हूँ

ब-फैज़े हस्सान इब्ने साबित, ब-रंगे-ना’ते-रसूले-रहमत
क़मर मैं शेरो-सुखन की लय में अदब के मोती उगल गया हूँ

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sarkaar sa pyara siddiq samara

परवाने को चराग़ तो बुलबुल को फ़ूल बस
सिद्दीक़ के लिये है ख़ुदा का रसूल बस

मुस्तफ़ा का हमसफ़र, अबू बकर, अबू बकर
गली गली नगर नगर, अबू बकर, अबू बकर
लुटाया जिसने अपना घर, अबू बकर, अबू बकर
एहसान जिस का दीन पर, अबू बकर, अबू बकर
है चर्चे जिस के अर्श पर, अबू बकर, अबू बकर
लगेगा नारा फर्श पर, अबू बकर, अबू बकर

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

दुनिया-ए-सदाक़त में तेरा नाम रहेगा
सिद्दीक़ तेरे नाम से इस्लाम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

सिद्दीक़ के गुस्ताख़ से तो जंग रहेगी
जो इन से जलेगा वोही नाकाम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

बे लोस मुहब्बत का सिला ख़ूब मिला है
ता-हश्र मुहम्मद के संग आराम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

हर नस्ल तेरे काम की तजदीद करेगी
जब तक रहेगी दुनिया तेरा नाम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

सिद्दीक़ के बाग़ी तो सदा रोते रहेंगे
खुश आशिक़े-सिद्दीक़ सुबहो-शाम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

सिद्दीक़ की बैअत जो की हसनैनो-अली ने
तारीख़ी फ़ैसला तो सरे आम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

अस्हाबे-नबी, आले-नबी दीन की पहचान
जो दिल का है अंधा वोही ग़ुमनाम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

हर अहद पे सिद्दीक़ का एहसान उजागर
बा’द अज़ नबी सिद्दीक़ का इकराम रहेगा

सालारे-सहाबा, वो पहला ख़लीफ़ा
सरकार का प्यारा, सिद्दीक़ हमारा
हर सुन्नी का नारा, सिद्दीक़ हमारा

परवाने को चराग़ तो बुलबुल को फ़ूल बस
सिद्दीक़ के लिये है ख़ुदा का रसूल बस

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