Tujhi ko jo yan

तुझी को जो याँ जल्वा-फ़रमा न देखा
बराबर है दुनिया को देखा न देखा

मिरा ग़ुंचा-ए-दिल है वो दिल गिरफ़्ता
कि जिस को किसू ने कभू वा न देखा

यगाना है तू आह बेगानगी में
कोई दूसरा और ऐसा न देखा

अज़िय्यत मुसीबत मलामत बलाएँ
तिरे इश्क़ में हम ने क्या क्या न देखा

किया मुज को दाग़ों ने सर्व-ए-चराग़ाँ
कभू तू ने आ कर तमाशा न देखा

तग़ाफ़ुल ने तेरे ये कुछ दिन दिखाए
इधर तू ने लेकिन न देखा न देखा

हिजाब-ए-रुख़-ए-यार थे आप ही हम
खुली आँख जब कोई पर्दा न देखा

शब ओ रोज़ ऐ ‘दर्द’ दर पे हूँ उस के
किसू ने जिसे याँ न समझा न देखा

Read More...

Sanam hazar hua

सनम हज़ार हुआ तो वही सनम का सनम
कि अस्ल हस्ती-ए-नाबूद है अदम का अदम

इसी जहान में गोया मुझे बहिश्त मिली
अगर रखोगे मिरे पर यही करम का करम

अभी तो तुम ने किए थे हमारी जाँ-बख़्शी
फिर एक दम में वही नीमचा अलम का अलम

वो गुल-बदन का अजब है मिज़ाज-ए-रंगा-रंग
फ़जर कूँ लुत्फ़ तो फिर शाम कूँ सितम का सितम

न रख ‘सिराज’ किसी ख़ूब-रू सें चश्म-ए-वफ़ा
सनम हज़ार हुआ तो वही सनम का सनम

Read More...

Main yar ka jalwa hun

मैं यार का जल्वा हूँ
या दीदा-ए-मूसा हूँ

क़तरा हूँ न दरिया हूँ
बस्ती हूँ न सहरा हूँ

जीना मिरा मरना है
मरने को तरसता हूँ

अपनी ही उमीदों का
बिगड़ा हुआ नक़्शा हूँ

अरमानों का गहवारा
हसरत का जनाज़ा हूँ

इस आलम-ए-हस्ती में
यूँ हूँ कि मैं गोया हूँ

ज़िंदा हूँ मगर बेदम
इक तुर्फ़ा-तमाशा हूँ

Read More...

Jag mein aa kar

जग में आ कर इधर उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा

जान से हो गए बदन ख़ाली
जिस तरफ़ तू ने आँख भर देखा

नाला फ़रियाद आह और ज़ारी
आप से हो सका सो कर देखा

उन लबों ने न की मसीहाई
हम ने सौ सौ तरह से मर देखा

ज़ोर आशिक़-मिज़ाज है कोई
‘दर्द’ को क़िस्सा मुख़्तसर देखा

Read More...

Fida kar jaan

फ़िदा कर जान अगर जानी यही है
अरे दिल वक़्त-ए-बे-जानी यही है

यही क़ब्र-ए-ज़ुलेख़ा सीं है आवाज़
अगर है यूसुफ़-ए-सानी यही है

नहीं बुझती है प्यास आँसू सीं लेकिन
करें क्या अब तो याँ पानी यही है

किसी आशिक़ के मरने का नहीं तरस
मगर याँ की मुसलमानी यही है

बिरह का जान कंदन है निपट सख़्त
शिताब आ मुश्किल आसानी यही है

पिरो तार-ए-पलक में दाना-ए-अश्क
कि तस्बीह-ए-सुलैमानी यही है

मुझे ज़ालिम ने गिर्यां देख बोला
कि इस आलम में तूफ़ानी यही है

ज़मीं पर यार का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा
हमारा ख़त्त-ए-पेशानी यही है

वो ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन लगती नहीं हात
मुझे सारी परेशानी यही है

न फिरना जान देना उस गली में
दिल-ए-बे-जान की बानी यही है

किया रौशन चराग़-ए-दिल कूँ मेरे
‘सिराज’ अब फ़ज़्ल-ए-रहमानी यही है

Read More...

Waseem Barelvi Shayari

हर साँस किसी मरहम से कम ना थी
मैं जैसे कोई ज़ख़्म था भरता चला गया

ये सोच कर मैं उसके बराबर नही गया
दरया के पास कोई समंदर नही गया

आते आते मिरा नाम सा रह गया
उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया

अपनी इस आदत पे ही इक रोज़ मारे जाएँगे
कोई दर खोले न खोले हम पुकारे जाएँगे

आज पी लेने दे जी लेने दे मुझ को साक़ी
कल मिरी रात ख़ुदा जाने कहाँ गुज़रेगी

इन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था कि मेरे थे
ये अश्क कौन से ऊँचे घराने वाले थे

इसी ख़याल से पलकों पे रुक गए आँसू
तिरी निगाह को शायद सुबूत-ए-ग़म न मिले

Read More...

Ishq Mein Zillat Hui

इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई
आख़िर आख़िर जान दी यारों ने ये सोहबत हुई

अक्स उस बे-दीद का तो मुत्तसिल पड़ता था सुब्ह
दिन चढ़े क्या जानूँ आईने की क्या सूरत हुई

लौह-ए-सीना पर मिरी सौ नेज़ा-ए-ख़त्ती लगे
ख़स्तगी इस दिल-शिकस्ता की इसी बाबत हुई

खोलते ही आँखें फिर याँ मूँदनी हम को पड़ीं
दीद क्या कोई करे वो किस क़दर मोहलत हुई

पाँव मेरा कल्बा-ए-अहज़ाँ में अब रहता नहीं
रफ़्ता रफ़्ता उस तरफ़ जाने की मुझ को लत हुई

मर गया आवारा हो कर मैं तो जैसे गर्द-बाद
पर जिसे ये वाक़िआ पहुँचा उसे वहशत हुई

शाद ओ ख़ुश-ताले कोई होगा किसू को चाह कर
मैं तो कुल्फ़त में रहा जब से मुझे उल्फ़त हुई

दिल का जाना आज कल ताज़ा हुआ हो तो कहूँ
गुज़रे उस भी सानेहे को हम-नशीं मुद्दत हुई

शौक़-ए-दिल हम ना-तवानों का लिखा जाता है कब
अब तलक आप ही पहुँचने की अगर ताक़त हुई

क्या कफ़-ए-दस्त एक मैदाँ था बयाबाँ इश्क़ का
जान से जब उस में गुज़रे तब हमें राहत हुई

यूँ तो हम आजिज़-तरीन-ए-ख़ल्क़-ए-आलम हैं वले
देखियो क़ुदरत ख़ुदा की गर हमें क़ुदरत हुई

गोश ज़द चट-पट ही मरना इश्क़ में अपने हुआ
किस को इस बीमारी-ए-जाँ-काह से फ़ुर्सत हुई

बे-ज़बाँ जो कहते हैं मुझ को सो चुप रह जाएँगे
मारके में हश्र के गर बात की रुख़्सत हुई

हम न कहते थे कि नक़्श उस का नहीं नक़्क़ाश सहल
चाँद सारा लग गया तब नीम-रुख़ सूरत हुई

इस ग़ज़ल पर शाम से तो सूफ़ियों को वज्द था
फिर नहीं मालूम कुछ मज्लिस की क्या हालत हुई

कम किसू को ‘मीर’ की मय्यत की हाथ आई नमाज़
ना’श पर उस बे-सर-ओ-पा की बला कसरत हुई

Read More...

Aab Aankhon Mein

अब आँखों में ख़ूँ दम-ब-दम देखते हैं
न पूछो जो कुछ रंग हम देखते हैं

जो बे-अख़्तियारी यही है तो क़ासिद
हमीं आ के उस के क़दम देखते हैं

गहे दाग़ रहता है दिल गा जिगर ख़ूँ
उन आँखों से क्या क्या सितम देखते हैं

अगर जान आँखों में उस बिन है तो हम
अभी और भी कोई दम देखते हैं

लिखें हाल क्या उस को हैरत से हम तो
गहे काग़ज़ ओ गह क़लम देखते हैं

वफ़ा-पेशगी क़ैस तक थी भी कुछ कुछ
अब उस तौर के लोग कम देखते हैं

कहाँ तक भला रोओगे ‘मीर’-साहिब
अब आँखों के गिर्द इक वरम देखते हैं

Read More...

Dekha hai jis ne

देखा है जिस ने यार के रुख़्सार की तरफ़
हरगिज़ न जावे सैर कूँ गुलज़ार की तरफ़

आईना-दिल की चश्म में नूर जमाल दोस्त
रौशन हुआ है हर दर-ओ-दीवार की तरफ़

मंज़ूर है सलामती-ए-ख़ूँ अगर तुझे
मत देख उस की नर्गिस-ए-बीमार की तरफ़

वहाँ नहीं बग़ैर जौहर-ए-शमशीर ख़ूँ-बहा
ज़ाहिद न जा वो ज़ालिम-ए-खूँ-ख़्वार की तरफ़

है दिल कूँ अज़्म-ए-चौक उमीद-ए-विसाल पर
दीवाना का ख़याल है बाज़ार की तरफ़

क्या पूछते हो तुम कि तिरा दिल किधर गया
दिल का मकाँ कहाँ? यही दिलदार की तरफ़

परवाना कूँ नहीं है मगर ख़ौफ़-ए-जाँ ‘सिराज’
नाहक़ चला है शोला-ए-दीदार की तरफ़

Read More...

Har taraf yar ka tamasha hai

हर तरफ़ यार का तमाशा है
उस के दीदार का तमाशा है

इश्क़ और अक़्ल में हुई है शर्त
जीत और हार का तमाशा है

ख़ल्वत-ए-इंतिज़ार में उस की
दर-ओ-दीवार का तमाशा है

सीना-ए-दाग़ दाग़ में मेरे
सहन-ए-गुलज़ार का तमाशा है

है शिकार-ए-कमंद-ए-इश्क़ ‘सिराज’
इस गले हार का तमाशा है

Read More...