Urdu Kalam नात ए शरीफ़ : (अरबी – نعت) उर्दू और फ़ारसी में नात ए शरीफ़ (نعت شریف) : इस्लामी पद्य साहित्य में एक पद्य रूप है, जिस में पैगंबर हज़रत मुहम्मद (saw.) की तारीफ़ करते लिखी जाती है। इस पद्य रूप को बडे अदब से गाया भी जाता है। अक्सर नात ए शरीफ़ लिखने वाले आम शायर को नात गो शायर कहते हैं

न सुनो मेरे नाले हैं दर्द-भरे दार-ओ-असरे आह-ए-सहरे
तुम्हें क्या जो कोई मरता है मिरे ऐ दुश्मन-ए-जाँ बे-दाद-गरे

तिरी सुर्मगीं आँखों के सदक़े इन्हें छेड़ न पंजा-ए-मिज़्गाँ से
अभी ज़ख़्म-ए-जिगर हैं तमाम हरे ऐ महव-ए-तग़ाफ़ुल बे-ख़बरे

Naat-Sharif

लिया इश्क़ में जोग भिकारी बने तिरे नक़्श-ए-क़दम के पुजारी बने
कभी सज्दे किए कभी गिर्द फिरे बुत सीम-बरे ज़र्रीं-कमरे

यह नात ख्वानी Urdu Kalam का रिवाज भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में आम है। भाशा अनुसार देखें तो, पश्तो, बंगाली, उर्दू और पंजाबी में नात ख्वानी आम है। नात ख्वां तुर्की, फ़ारसी, अरबी, उर्दू, बंगाली, पंजाबी, अंग्रेज़ी, कश्मीरी और सिंधी भाशाओं में आम है।

जो तू ने हज़ारों वादे किए लेकिन वो कभी ईफ़ा न हुए
दिल ही हैं रहे अरमान मिरे ऐ वादा-शिकन बुत हीला-गिरे

‘बेदम’ कहें क्या किस तरह रहे मर मर के जिए जी जी के मरे
दर-मंज़िल-ए-इशक़श दर-बदरे मजनून-ए-शोरीदा-सरे

इमाम अहमद रज़ा खान ने कुरान ए करीम का उर्दू अनुवाद भी किया जिसे कंजुल ईमान नाम से जाना जाता है, आज उनका तर्जुमा इंग्लिश, हिंदी, तमिल, तेलुगू, फारसी, फ्रेंच, डच, स्पैनिश, अफ्रीकी भाषा में अनुवाद किया जा रहा है

ये माना मैं थका-हारा मुसाफ़िर हूँ मगर फिर भी
तुम्हारे साथ चलने का कोई रस्ता निकल आता

तिरी यादों की पथरीली ज़मीं शादाब हो जाती
अगर आँखों के सहरा से कोई दरिया निकल आता

कहाँ बे-ताब रख सकता था फिर एहसास-ए-महरूमी
दयार-ए-ग़ैर में तुम सा कोई अपना निकल आता