Na kahin sahare maharaban ki hawa ghazal-in-hindi

ना कहीं सहेरे,माहेर-बाँ की हवा
ना कोई यारे हम-दम,बा-दम सार|

ना सारे बांम जुल्फे आवारा
ना सारे राह चस्मे,फितना तराज़|

ना कहीं कुएँ चाक दामन
ना कहीं रुए,दोस्ताने फ़राज़|

ना कोई बैतेय,बे-दिल,बा ग़ालिब
ना कोई शाएरे,हाफिज़े सिराज़ी|

ना कोई शम्मा कुस्तये शब है
ना कोई अन्द-लीब सीना गुदाज़|

खिल्बते गम ,ना बाज़मे रुसबाई
ना सवाले तलब, ना अर्ज़े नियाज़

चार सू एक फ़ासले बे दर है
चार जानिब हिसारे बे अंदाज़|

नींद के तयिरने बे परवहा
शाके मशरगा से कर गये परवाज़|

एसी वीरानी-यो से घबरा कर
जब उठता हू,तेरी याद का साज़|

तोड़ देती है सिलसिले सारे
पहेरे-दारो की बद नुमा आवाज़