Hindi Ghazal Tuur kyu khaak huya noor tera naaz na tha[daag delvi]

तूर क्यों ख़ाक हुआ नूर तेरा नाज़ न था
नाज़ था हज़रते मूसा से वो दीदार न था

हमी-चूं के गम-ए दिल काबिल-ए न था
बात में यार ये बिगड़ा के कबि यार न था

आसमान पायों पड़ा है के क़यामत है ज़ालिम
यूँ तो चलता हुआ हर फितना रफ़्तार न था

दिल हुआ ख़ाक तो अक्सीर किसी ने जाना
था ये जब माल तो कोई भी खरीदार न था

ज़िक्रे मजनू से मुझे आग लग जाती है
गर-चे ज़ाहिर है वो तुम्हारा तलब गार न था

याद आती थी हसीनो को ये अंदाज़े ज़फ़ा
या कोई अगले ज़माने में खता बार न था

शब् को क्यों न कर ख़ालिशे दिल न दिखाती लज़्ज़त
तेरा अरमान था, पैकान न था खार न था

गमे जावेद की लज़्ज़त मेरे दिल से पूछो
मिल गया वो मुझको जिसका मैं सज़ादार न था

बात क्या चाहिए जब मुफ्त की हुज्जत ठैरी
उस गुन्हा पे मुझे मारा के गुन्हा गार न था

क्यों मेरे बाद उठया सितम इस्के रकीब
क्या मेरे दाग से ज़ालिम ये गर अंबार न था

सहर थी चश्मे फसूं साज़ के मिलते ही नज़र
मैंने पहलू में जो देखा तो दिलेज़ार न था

एक होने से रकीबो के हुआ क्या क्या कुछ
गम न था रस्क न था दाग न था खार न था

एक ही जलबा दिखा के मुझे धोके में न डाल
दिल कहे यार ही था मैं कहूं यार न था

जाल उस ज़ुल्फ़े परिसँ ने बिछाया ए दिल
ले सम्बल फिर ये न कहना के खबर दार न था

दिल का सौदा और उस अगमाज़ से और ऐसी जगह
दाग वो अंजुमन-नाज़ थे बाजार न था