Baat karne ka nahi samne aane ka nahi hindi ghazal

बात करने का नहीं सामने आने का नहीं
वो मुझे मेरी अज़िय्यत से बचाने का नहीं

दूर इक शहर है जो पास बुलाता है मुझे
वर्ना ये शहर कहीं छोड़ के जाने का नहीं

क्या यूँही रोत के पहलू में कटेगी ये हयात
क्या कोई शहर के लोगों को जगाने का नहीं

अजनबी लोग हैं मैं जिन में घिरा रहता हूँ
आश्ना कोई यहाँ मेरे फ़साने का नहीं

ये जो इक शहर है ये जिस पे तसर्रूफ़ है मिरा
मैं यहाँ कोई भी दीवार बनाने का नहीं

बाद मुद्दत के जो आया था वही लौट गया
अब यहाँ कोई चराग़ों को जलाने का नहीं

आने वाली है नई सुब्ह ज़रा देर के बाद
क्या कोई राह-ए-तमन्ना को सजाने का नहीं