Azeez itna hi rakho ki gi sambhal jaye

अजीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाये
अब इस क़दर भी ना चाहो कि दम निकल जाये

मोहब्बतों में अजब है दिलों का धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये

मिले हैं यूं तो बहुत, आओ अब मिलें यूं भी
कि रूह गरमी-ए-इन्फास से पिघल जाये

मैं वो चिराग़ सर-ए-राह्गुज़ार-ए-दुनिया
जो अपनी ज़ात की तनहाइयों में जल जाये

ज़िहे! वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे
खुशा! वो उम्र जो ख़्वाबों में ही बहल जाये

हर एक लहज़ा यही आरजू यही हसरत
जो आग दिल में है वोह शेर में भी ढल जाये