Ahmad Faraz Ghazal hindi

Ahmad Faraz Ghazal hindi

Ahmad Faraz Ghazal hindi

अपनी ही आवाज़ को बे-शक कान में रखना
लेकिन शहर की खामोशी भी धियान में रखना

मेरे झूट को खोलो भी और तोलो भी तुम
लेकिन अपने सच को भी मीज़ान में रखना

कल तारिख यक़ीनन खुद को धो-राएगी
आज के एक एक मंज़र को पैचान में रखना

बज़म में यारों की शमसीर लहू में तर है
रम्ज़ में लेकिन तलबारो को मियान में रखना

आज तो ए दिल तरके-ताल्लुक पर तुम खुश हो
कल के पछताबे को भी इमकान में रखना

इस दरया के आगे एक समंदर भी है
और वो बे साहिल है ये भी धयान में रखना

इस मौसम में गुलदानों की रसम कहा है
लोगो अब फूलों को आतिस दान में रखना

अहमद फ़राज़ का जन्म कोहाट (तब ब्रिटिश भारत) में सैयद मुहम्मद शाह बरक़ के यहाँ हुआ था।
उनके भाई सैयद मसूद कौसर हैं। वह अपने परिवार के साथ पेशावर चले गए। उन्होंने प्रसिद्ध एडवर्ड्स कॉलेज, पेशावर में अध्ययन किया
और पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू और फ़ारसी में परास्नातक प्राप्त किया। अपने कॉलेज जीवन के दौरान, प्रगतिशील कवि फैज अहमद फैज और अली सरदार जाफरी उनके सबसे अच्छे दोस्त थे,
जिन्होंने उन्हें प्रभावित किया और उनके आदर्श बन गए। जातीय रूप से एक पश्तून सैयद, अहमद फ़राज़ ने पेशावर विश्वविद्यालय में फ़ारसी और उर्दू का अध्ययन किया।
बाद में वे पेशावर विश्वविद्यालय में व्याख्याता बने।

Ahmad Faraz Ghazal hindi
Ahmad Faraz Ghazal hindi

अहमद फ़राज़ एक पाकिस्तानी उर्दू कवि थे।
उन्हें पिछली शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ आधुनिक उर्दू कवियों में से एक के रूप में प्रशंसित किया गया था।
‘फ़राज़’ उनका कलम नाम है। 25 अगस्त 2008 को इस्लामाबाद में उनका निधन हो गया।
उन्हें पाकिस्तान सरकार द्वारा हिलाल-ए-इम्तियाज, सितारा-ए-इम्तियाज और उनकी मृत्यु के बाद हिलाल-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया।

Ahmad Faraz shayri ghazal

गिरफ्ता दिल अंदलीप घायल गुलाब देखे
मोहब्बतों ने सभी लम्हो में अज़ाब देखे

वो दिन भी आये सलीब गर भी सलीब पर हूँ
ये शहर एक रोज़ फिर से योमे हिसाब देखे

ये सुबहेका ज़ेब तो रात से भी तबील तर है
के जैसे सदयाँ गुज़र गयी आफ़ताब देखे

वो चश्मे महरूम कितनी महरूम है के जिस ने
न खुआब देखे न रत-जगो के अज़ाब देखे

कहाँ की आँखे के अब तो चेरो पे आबले है
और आब्लो से भला कोई कैसे खुआब देखे

अजब नहीं है जो खुश्बुओं से है शहर ख़ाली
के मैंने दहलीज़ क़ातिल पर गुलाब देखे

ये सा-आते दीद और बये-सत बढ़ा गयी है
जैसे कोई जुनु ज़दा महताब देखे

मुझे तो हम मकतबी के दिन आ गए है
के मैं उसे पड़ रहा हु और वो किताब देखे