Bikhar jayege hum kya tamasha khatam hoga

बिखर जाएँगे हम क्या जब तमाशा ख़त्म होगा
मिरे मा’बूद आख़िर कब तमाशा ख़त्म होगा

चराग़-ए-हुज्रा-ए-दर्वेश की बुझती हुई लौ
हवा से कह गई है अब तमाशा ख़त्म होगा

कहानी में नए किरदार शामिल हो गए हैं
नहीं मा’लूम अब किस ढब तमाशा ख़त्म होगा

कहानी आप उलझी है कि उलझाई गई है
ये उक़्दा तब खुलेगा जब तमाशा ख़त्म होगा

ज़मीं जब अद्ल से भर जाएगी नूरुन-अला-नूर
ब-नाम-ए-मस्लक-ओ-मज़हब तमाशा ख़त्म होगा

ये सब कठ-पुतलियाँ रक़्साँ रहेंगी रात की रात
सहर से पहले पहले सब तमाशा ख़त्म होगा

तमाशा करने वालों को ख़बर दी जा चुकी है
कि पर्दा कब गिरेगा कब तमाशा ख़त्म होगा

दिल-ए-ना-मुतमइन ऐसा भी क्या मायूस रहना
जो ख़ल्क़ उट्ठी तो सब कर्तब तमाशा ख़त्म होगा

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Mere raste me maikada pada

जब मेरे रास्ते में कोई मय-कदा पड़ा
इक बार अपने ग़म की तरफ़ देखना पड़ा

तर्क-ए-तअल्लुक़ात को इक लम्हा चाहिए
लेकिन तमाम उम्र मुझे सोचना पड़ा

इक तिश्ना-लब ने छीन लिया बढ़ के जाम-ए-मय
साक़ी समझ रहा था सभी को गिरा-पड़ा

आए थे पूछते हुए मयख़ाने का पता
साक़ी से लेकिन अपना पता पूछना पड़ा

यूँ जगमगा रहा है मिरा नक़्श-ए-पा ‘फ़ना’
जैसे हो रास्ते में कोई आइना पड़ा

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To phool ki manid N shabnam ki tarah aa

तू फूल की मानिंद न शबनम की तरह आ
अब के किसी बे-नाम से मौसम की तरह आ

हर मर्तबा आता है मह-ए-नौ की तरह तू
इस बार ज़रा मेरी शब-ए-ग़म की तरह आ

हल करने हैं मुझ को कई पेचीदा मसाइल
ऐ जान-ए-वफ़ा गेसू-ए-पुर-ख़म की तरह आ

ज़ख़्मों को गवारा नहीं यक-रंगी-ए-हालात
नश्तर की तरह आ कभी मरहम की तरह आ

नज़दीकी ओ दूरी की कशाकश को मिटा दे
इस जंग में तू सुल्ह के परचम की तरह आ

माना कि मिरा घर तिरी जन्नत तो नहीं है
दुनिया में मिरी लग़्ज़िश-ए-आदम की तरह आ

तू कुछ तो मिरे ज़ब्त-ए-मोहब्बत का सिला दे
हंगामा-ए-फ़ना दीदा-ए-पुर-नम की तरह आ

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Sakiya to ne mere zarf ko samjha kya

साक़िया तू ने मिरे ज़र्फ़ को समझा क्या है
ज़हर पी लूँगा तिरे हाथ से सहबा क्या है

मैं चला आया तिरा हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल ले कर
अब तिरी अंजुमन-ए-नाज़ में रक्खा क्या है

न बगूले हैं न काँटे हैं न दीवाने हैं
अब तो सहरा का फ़क़त नाम है सहरा क्या है

हो के मायूस-ए-वफ़ा तर्क-ए-वफ़ा तो कर लूँ
लेकिन इस तर्क-ए-वफ़ा का भी भरोसा क्या है

कोई पाबंद-ए-मोहब्बत ही बता सकता है
एक दीवाने का ज़ंजीर से रिश्ता क्या है

साक़िया कल के लिए मैं तो न रक्खूँगा शराब
तेरे होते हुए अंदेशा-ए-फ़र्दा क्या है

मेरी तस्वीर-ए-ग़ज़ल है कोई आईना नहीं
सैकड़ों रुख़ हैं अभी आप ने देखा क्या है

साफ़-गोई में तो सुनते हैं ‘फ़ना’ है मशहूर
देखना ये है तिरे मुँह पे वो कहता क्या है

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Koi Sahara na raha

कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा

शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे
जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा

ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से
तुम मिरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा

क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ
जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा

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Jo samjhate bhi aa kar wise-e-barham

जो समझाते भी आ कर वाइज़-ए-बरहम तो क्या करते
हम इस दुनिया के आगे उस जहाँ का ग़म तो क्या करते

हरम से मय-कदे तक मंज़िल-ए-यक-उम्र थी साक़ी
सहारा गर न देती लग़्ज़िश-ए-पैहम तो क्या करते

जो मिट्टी को मिज़ाज-ए-गुल अता कर दें वो ऐ वाइज़
ज़मीं से दूर फ़िक्र-ए-जन्नत-ए-आदम तो क्या करते

सवाल उन का जवाब उन का सुकूत उन का ख़िताब उन का
हम उन की अंजुमन में सर न करते ख़म तो क्या करते

जहाँ ‘मजरूह’ दिल के हौसले टूटें निगाहों से
वहाँ करते भी मर्ग-ए-शौक़ का मातम तो क्या करते

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